बदलती जीवन शैली व आधुनिकता की दौड़ ने लकड़ी से तैयार होने वाले परंपरागत बर्तनों को हाशिए पर ला दिया है। हस्तशिल्पियों द्वारा तैयार किए जाने वाले डोकला, ठेकी, माणा की जगह स्टील व अन्य धातुओं के बर्तनों ने ले ली है। शिल्पियों की घटती तादाद व सरकार की बेरुखी के चलते यह परंपरागत हुनर अब अंतिम साँसें गिन रहा है।
सदियों से पहाड़ों में रहने वाले लोग दूध, दही, मठ्ठा, घी रखने के लिये लकड़ी के बर्तनों का प्रयोग करते आ रहे हैं। लकड़ी के बर्तन बनाने वाले हस्तशिल्पियों को चुनेर कहा जाता है। हर साल नवंबर के पहले हफ्ते में खासतौर से बागेश्वर के चचई गाँव से हुनरमंदों के कईं दल क्षेत्र की नदियों के किनारे डेरे लगाकर सर्दियों भर अपनी काष्ठकला से लकड़ी के ढेरों बर्तन तैयार करते है। चार माह तक बर्तन तैयार करने के बाद यायावर हुनरमंद मार्च में उनको बेचने के लिए खरीददारों की तलाश में पहाड़ों को निकल जाते है। इन दिनों भी रामनगर में कोसी, बांगाझाला, खिचड़ी व बौर नदी में जंगलों के बीच एकांत में चुनेरों के दल लकड़ी के बर्तन तैयार करने में जुटे हैं। नदी की धारा से घूमते खराद पर लगे साणे पर लोहे की सांबी से ठोस सांदण लकड़ी को कुरेदकर ठेकी, डोकला, माणा, हुड़का, बिंडा व दुमका सहित अनेक छोटे-बड़े बर्तन तैयार होते हैं। पानी से चलने वाली खराद पर पुश्तैनी पेशे में लगे चुनरों को इसके लिए वन विभाग से बाकायदा सांदण की लकड़ी का परमिट लेना पड़ता है। एक बर्तन दो सौ से एक हजार रुपये तक बिकता है। दस्तकार कमलराम, बिशनराम कहते हैं कि बर्तनों के सही दाम नहीं मिलने, कच्ची लकड़ी के बढ़ते दाम व बर्तन बाजार में प्लास्टिक, चीनी मिट्टी, स्टील की बढ़ती घुसपैठ ने इस धंधे को काफी नुकसान पहुँचाया है। नई पीढ़ी में पुश्तैनी परंपरा को सीखने की दिलचस्पी नही के बराबर है। सरकार की तरफ से उनको किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिलता है, जिसके चलते यह बर्तन बनाने वालों की तादाद घटती जा रही है। वह तो केवल पुश्तैनी विरासत को सहेजने का कार्य कर रहे हैं। सरकार को बर्तन तैयार करने की काष्ठकला को संरक्षण देना चाहिए।