प्रस्तुति : देवेन्द्र नैनवाल
‘बाबा बेला जाय’ अर्थात् ‘‘पिताजी, समय बीता जा रहा है!’’ बाङ्ला भाषा की इस अनूठी कृति ने आज से चालीस पचास साल पहले मानस को झकझोरा था, किन्तु तब वयस नहीं थी कि जीवन के इस गम्भीर दर्शन को आत्मसात किया जा सकता। किन्तु इतने सालों के बाद उस कृति को पुनः कुमाउनी भाषा में ‘दुदबोलि’ के इस अंक में पढ़ने पर, वर्ण़नातीत रोमांच हो आया। इसके अलावा और भी बाङ्ला कविताएँ इसमें पढ़ने को मिलीं, जिनका नारायण चन्द्र भारती ने कभी कुमाउनी में अनुवाद किया था। इतना ही नहीं कुमाउनी में लिखे गये मौलिक साहित्य का एक बड़ा खजाना दुदबोलि के इस अंक में संकलित किया गया है। आज जिस तरह अनेक छोटी भाषाएँ एक-एक कर लुप्त होती जा रही हैं कुमाँउनी के लिये भी खतरा पैदा होने लगा है।
भाषा का संस्कृति से अटूट सम्बन्ध होता है। भाषा को उपेक्षित कर संस्कृति का संरक्षण सम्भव नहीं है। बहुत थोड़े लोग हैं जो इस तथ्य को समझते हैं और कुमाउनी के विकास हेतु समर्पित हैं। दुदबोलि के सम्पादक मथुरा दत्त मठपाल विगत कई वर्षों से कुमाउनी भाषा की सेवा में तन मन धन से लगे हए हैं। लगभग दसेक साल पहले उन्हों ने दुदबोलि का प्रकाशन आरम्भ किया था और बाधाओं से जूझते हुए भी इसे चालू रखा है।
दुदबोलि -2008 पूर्व प्रकाशित रचनाओं का महत्वपूर्ण संकलन है। इसमें मुख्यतः कुमाँउनी भाषा पर सामग्री है। परन्तु गढ़वाली तथा नेपाली की भी कुछ रचनाओं को स्थान दिया गया है। नेपाली रचनाओं में जयराज पन्त का कुमाऊँ से सटे हुए नेपाली क्षेत्रों के पारम्परिक लोक मांगल गीत विषयक प्रस्तुतियाँ अनूठी हैं, और शोधकर्ताओं के लिये भी महत्वपूर्ण हैं।
दुदबोलि-2008, वार्षिकांक (कुमाउनी पत्रिका)
सम्पादक-मथुरा दत्त मठपाल
वार्षिक सहयोग राशि -रुपया एक सौ पचास मात्र
प्रकाशक- गंगा प्रकाशन, पम्पापुर, पोस्टः रामनगर (जिला नैनीताल), उत्तराखण्ड

























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