वन विभाग पहाड़ों में एक नए जमींदार के रूप में अवतरित हो गया है। उसने यहाँ वनों में घूमनेवाले पर्यटकों पर एक कर लगा दिया है, जिसे नाम दिया गया है ‘ईको टूरिज्म कर’। देश-विदेश से हिमालय देखने-घूमने साल में लाखों लोग आते हैं, गर्मिंयों में अधिक। यदि ये लोग जंगलों में घूमना चाहते हों, जो सबसे आनंदमय पर्यटन है, तो उनसे यह शुल्क या कर लिया जाता है। सबसे अधिक सुंदर तथा प्रसिद्ध नंदादेवी राष्ट्रीय वन विहार है, जिसके प्रवेश-पथों पर विभाग ने कर्मचारी तैनात कर दिए गए हैं, जो प्रत्येक पर्यटक से वहाँ घूमने के लिऐ 80 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से शुल्क देने को कहते हैं। दरअसल जंगलात कार्यालय से प्रवेश पत्र शुल्क देकर पहले लेना होता है और उसके बाद ही कर्मचारी वनों में घूमने जाने देते हैं। इसे विभाग ट्रेल मैनेजमेंट फी या रास्ते के रख-रखाव की फीस कहता है। रात को यदि पर्यटक अपने 6 फीट गुणा 7 फीट के तम्बू में सोता है तो तंबू का भी अलग से शुल्क देना होता है, जो 100 रुपए प्रति रात्रि है। नियम है कि पर्यटक अपना कूडा-कचरा जंगल में नहीं छोडे़गा और उसे अपने साथ उठा बाहर लाएगा।
इस कर के लिए वन विभाग ने कोई सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई हैं। रास्तों, पानी के स्रोतों, पहाड़ों या पास के गाँवों के मानचित्र नहीं दिए जाते, न ही रात्रि-विश्राम स्थल बने हैं। चाय या खाने की दुकानें भी नहीं हैं। जहाँ पर यात्री बड़ी संख्या में चलते हैं, वहाँ उनके पैरों की लीक से रास्ते बन गए हैं, जिन पर एक से दूसरी जगह जाया जाता है। रास्ते भर की ढलानों पर चरागाह हैं, जिन पर कभी-कभार आसपास के गाँव वाले मिल जाते हैं।
पास ही जहाँ ईको टूरिज्म काबिज़ हुआ है, वह स्थान है सिखों का गोविन्द्घाट से हेमकुंड साहिब जाने का मार्ग। इस पैदल 21 किमी. कठिन चढ़ाई वाले मार्ग पर जून से अक्टूबर तक लाखों लोग यात्रा करते हैं। यह मार्ग ऊँचाई पर पाए जाने वाले भोजपत्र वन से हो कर जाता है। इस पर रात्रि विश्राम के लिए घाँघरिया में यात्रियों के लिए गुरुद्वारा, निवास तथा खाने की दुकानें हैं। उससे आगे छः किमी. की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद एक निर्जन स्थान पर हेमकुंड साहिब है। इस रास्ते पर यात्रा के महीनों में जगह-जगह कच्ची दुकानें होती हैं, जिनमें खाने-पीने की चीज़ें मिल जाती हैं। यात्री अपने साथ भी खाने-पीने का सामान, जैसे बिस्कुट, पानी की प्लास्टिक बोतल आदि ले कर चलते हैं। यह सामग्री प्लास्टिक के जिन थैलों में लाई जाती है, उन्हें इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है, जो रास्ते भर बिखरे पड़े मिलते हैं। यह रास्ता भी वन अधिकृत भूमि से होकर जाता है। इसमें दो-एक गाँव पड़ते हैं। पहाड़ के गाँवों में स्त्रियों ने स्वयंसेवी संस्थाएँ, महिला मंगल दल बनाए हैं, जिनके द्वारा वे अपनी समस्याएँ हल करने की चेष्टा करती हैं। वन विभाग ने उनसे कहा कि वे यदि इस कूड़े को इकट्ठा करें तो इसके लिए महिला मंगल दलों को कुछ धन दिया जा सकता है। इस तरह वहाँ की महिलाओं को अतिरिक्त काम दिया गया।
पहाड़ की महिलाएँ वैसे ही सुबह से शाम तक लगातार काम करती रहती हैं। सुबह अंधेरे उठ, स्कूल जाने वाले बच्चों तथा खेतों को जानेवाले पतियों के लिए रोटी-नाश्ता बनाना, गाय-भैंस का गोबर बाहर निकालना, फसल के समय खेतों में, नहीं तो घास-लकड़ी के लिए जंगल जाना, घर लौटना, दिन का खाना बनाना, कपडे धोना, अनाज पीसना, दूध दुहना, रात का खाना बनाना, सबको खिलाना, घर में झाडू लगा सबको सुला देना। दिन भर खड़े-खड़े उनको यह कमर तोड काम करना होता है। उसके ऊपर मिला वन विभाग का दिया गया काम। सड़कों पर फेंका प्लास्टिक उठा कर उसके बंडल बनाना। ये बंडल तब मोटर मार्ग से गोविंद घाट लाए जाते हैं, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व उन्हें गुरुद्वारा के पास जमा किया गया। एक साल में उनके बड़े अंबार लग गए। गुरुद्वारा समिति ने तब वन विभाग से उसे कहीं और ले जाने का अनुरोध किया क्योंकि उनसे बदबू आने लगी थी। महीनों तक इस काम के लिये कोई ठेकेदार नहीं मिला। लगभग साल भर बाद ही इस कूड़े को नीचे ले जाया जा सका।
पहले इस मार्ग को साफ रखने के लिये मैदानों से जो सफाई कर्मचारी मंगाए जाते थे, उससे कम खर्च पर महिला मंगल दलों से यह काम करवाया गया। महिला मंगल दलों को कुछ और काम भी सिखाए गए, जैसे फूलों की खेती, बुराँश के रस से शर्बत बनाना आदि। लेकिन यह काम यहाँ जीवनयापन का आधार नहीं बन सका। हाँ, उससे महिला मंगल दलों के हाथ कुछ पैसा अवश्य आया, लेकिन इतना नहीं कि उससे उनका जीवन-स्तर ऊँचा उठ सके। लेकिन वन विभाग ने इस ‘ईको टूरिज्म’ का अखबार-पत्रिकाओं में अत्यधिक प्रचार किया, जिसके फलस्वरूप विदेशों की कुछ संस्थाओं का ध्यान हुआ और उन्होंने तत्कालीन डी.एफ.ओ. को सम्मानित कर उन्हें कोई पदक दे दिया। उनके यहाँ से अन्यत्र स्थानांतरण के बाद स्थिति पुनः पहले जैसी हो गई। लेकिन नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में प्रवेश कर अभी भी लागू है। अगर आप उसके जंगलों तथा घास के मैदानों में घूमना चाहें तो यह कर प्रतिदिन के हिसाब से देना होगा।
उत्तराखंड सरकार का कहना है कि वह पर्यटन को बढ़ावा दे कर उसे अपनी आय का एक मुख्य साधन बनाना चाहती है। लेकिन पर्यटकों के लिए यहाँ के सुंदर स्थानों में जाना कितना कठिन होता है, उसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। अंग्रेज सरकार के समय का एक कानून अभी भी यहाँ लागू है, जिसे इनर लाइन कानून कहा जाता है। सरहदी क्षेत्र होने के कारण ठेठ सीमांत भूमि में प्रवेश वर्जित है। जगह-जगह यहाँ चौकियाँ खोली गई हैं, जो भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के अधिकार में हैं। समय-समय पर भारत सरकार इस क्षेत्रीय इनर लाइन में परिवर्तन करती रहती है। पर्यटकों के विचरण के लिए इनर लाइन कुछ और पीछे हटाई जाती है, ताकि वह अधिक जगहों पर घूम सकें। यहाँ का एक पर्यटक क्षेत्र है नीती घाटी, जहाँ से 1962 के चीनी सरहदी युद्ध पूर्व भारत का तिब्बत से अच्छा-बड़ा व्यापार होता था। उसके बाद यह पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र हो गया। यहाँ इनर लाइन पहले गमसाली गाँव से आरंभ होती थी। दो वर्ष पूर्व उसे और पीछे, अंतिम गाँव नीती तक हटा दिया गया, ताकि पर्यटक नीती तक निर्बाध यात्रा कर सकें। इस खबर को सरकारी गज़ट में छाप कर सबको सूचित कर दिया गया, किन्तु भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की चौकी अभी भी गमसाली गाँव में ही है और वह पर्यटकों को नीती तक नहीं जाने देती। कितना भी समझाओ कि सरकार ने इनर लाइन अब नीती तक हटा दी गई है, लेकिन सिपाही मानने को तैयार ही नहीं होते। वे स्वयं में कानून हैं।
वैसे जोशीमठ शहर से ही सीमांत क्षेत्र आरंभ हो जाता है। यहाँ आने पर विदेशी पर्यटकों को पुलिस को सूचना देनी होती है। और आगे, सीमांत की ओर जाने का सरकारी अधिकारी से पारपत्र लेना पडता है। पारपत्र लेने जब विदेशी पर्यटक अधिकारी के पास जाते हैं तो वह उनसे पूछताछ करवाने उन्हें पुलिस थाने भेज देता है। थाने वाले प्रत्येक पर्यटक से पूछते हैं कि क्यों वह आगे सीमांत क्षेत्र में जाना चाहता है ? संतुष्ट होने पर ही वह पर्यटक की अर्जी पर मुहर लगाते हैं। पर्यटकों के लिए इस सीमांत की यात्रा कठिन बना दी गई है। पर्यटन की पुस्तकों में इस क्षेत्र का विस्तार से वर्णन है। प्रसिद्ध विश्व धरोहर नंदादादेवी राष्ट्रीय पार्क तथा फूलों की घाटी यहीं स्थित हैं, जिन्हें देखने हज़ारों लोग प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं, किन्तु सीमांत कानूनों के कारण कुछ को इतनी दूर आने पर भी उन्हें देखना संभव नहीं हो पाता। उत्तराखंड सरकार कैसे पर्यटन का विकास करेगी?


























यदि सुविधाएँ मुहैय्या करायी जाती हैं तो उनके लिए शुल्क वसूली की जा सकती है. मध्य प्रदेश में एक अलग से ईको टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड गठित की गयी है और अब तक का उनका प्रयास सराहनीय है.