बेमतलब का बोझ बनकर रह गये हैं ये जाँच आयोग
राजधानी चयन आयोग रूपी सफेद हाथी को प्रदेश की भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने 8 साल तक पाला – पोसा। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जब आयोग ने प्रदेश सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो वह उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का चयन किये जाने के नाम पर ‘चार सौ बीसी’ के अलावा और कुछ [...]
खैरलिंग मेला: पशुबलि से खलबली
पौड़ी के निकट कल्जीखाल क्षेत्र में दो दिन के खैरलिंग मेले पर इस वर्ष प्रशासन, स्थानीय निवासियों, पशुबलि का विरोध करने वाली संस्था बिजाल से लेकर राजनीतिक दलों की भी नजर थी। सब इसी असमंजस में थे कि क्या इस वर्ष भी भैंसों की बलि दी जायेगी। वर्ष 2005 की घटना से प्रशासन चौंकन्ना था [...]
बदरीनाथ यात्रा में श्रद्धालुओं का उबाल
बदरीनाथ धाम में बढ़ती यात्रियों की संख्या तथा विशेष अतिथि (वी.आई.पी) को बिना लाइन में लगे दर्शन कराने पर यात्रियों तथा पुलिस दल के बीच 10 जून को मारपीट हो गई, जिसमें एक महिला को काफी चोट आई. इसके प्रतिरोध में धाम में एक दिन की हड़ताल हो गई। मंदिर में प्रवेश का एक द्वार [...]
सम्पादकीय : ‘फर्स्ट एमंग ईक्वल्स’ निशंक का उपलब्धि विहीन पहला साल
रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की भाजपा सरकार ने एक साल पूरा कर लिया है। औपचारिक पार्टी या सरकारी विज्ञप्तियों से इतर इस एक साल में क्या ऐसा कुछ हुआ है, जिस पर सरकार गर्व करे या कि जनता संतोष का अनुभव करे ? नवम्बर 2000 में राज्य का गठन होने के बाद मोहभंग का जो सिलसिला [...]
स्वस्ती – श्री : सड़क निर्माण पहाड़ की तलहटी से ही किया जाये।
ग्राम उत्तरौड़ा (पो. कपकोट) के बीचोंबीच राजमार्ग का निर्माण न होकर पहाड़ की तलहटी (जहाँ पी.डब्ल्यू.डी. की पुरानी पैदल सड़क थी) से ही निर्माण किये जाने सम्बन्धित प्रार्थनायें बार-बार शासन, प्रशासन एवं सरकार से कर चुके हैं। सच्चाई इस बात की है कि बीच से राजमार्ग के जबरन निर्माण से अधोलिखित नुकसान, बरबादी एवं विनाश [...]
जलते वनों के प्रति उपेक्षा और हमारा भविष्य
गर्मियों में मन को अत्यन्त व्यथित करने वाला एक दृश्य उत्तराखण्ड हिमालय में चारों ओर दिखाई देता है। वह है, वनों को निर्दयतापूर्वक नष्ट करती हुई वनाग्नि की धधकती लाल लपलपाती लपटें और उनसे उठते धुएँ के गुबार। यहाँ की खूबसूरत वादियाँ मानो कार्बन डाइ ऑक्साइड के गैस चैम्बर्स बन जाती हैं। पर मानव का [...]
पर्वतीय कृषि: भूमि की उत्पादकता का कैसे हो अधिक सदुपयोग
प्रस्तुति : माधवानन्द मैनाली ‘मधु’ मडुआ, गहत, पहाड़ी आलू, भट्ट, पहाड़ी गाय का दूध, घी और गौमूत्र आदि पहाड़ी उत्पादों ने बाजार में अपना प्रभुत्व जमाना आरम्भ कर दिया है। अब चुनौती है कि इनके उत्पादन को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाये। उत्तराखण्ड के 55.66 लाख हेक्टेअर क्षेत्रफल में 34.66 हेक्टेअर वन क्षेत्र है। बंजर [...]
क्या हमारे रणनीतिकार बिहार से सबक लेंगे ?
तथाकथित औद्योगिक विकास के कारण भले ही उत्तराखंड विकास दर के मामले में तीसरे स्थान पर हो, लेकिन इस विकास दर में खेती का योगदान लगातार घट रहा है। नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर के अनुसार, वर्ष 1999-2000 में उत्तराखंड में खेती का अंश 38 प्रतिशत था, जो अब घटकर 22 प्रतिशत पहुँच गया है। [...]
विकास कार्यों में आ रही अड़चनें तो दूर करनी ही होंगी
प्रस्तुति : हरीश फुलारा बढ़ते प्रदूषण एवं उससे मानव जीवन पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 1980 में वन अधिनियम लागू किया गया। इसके अन्तर्गत वन भूमि पर गैर वानिकी कार्य बिना भारत सरकार की पूर्वानुमति के नहीं किये जा सकते। नीति निर्धारकों द्वारा इसका दुरुपयोग किये जाने के [...]
गौंड धूर फिर जागा ?
पिछले कुछ समय से देश के आदिवासी इलाकों में जारी संघर्ष ने एक बार फिर इस बात को साबित कर दिखाया है कि आजाद भारत की सरकारों ने न कभी अपने सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास को समझना उचित समझा और न ही उससे कुछ सबक लेना चाहा है। आजादी के छः दशक बीत जाने के बाद भी [...]
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