सादगी उनका एक मिजाज था
इतने बड़े व्यक्तित्व के बारे में लिखना आसान नहीं है….. बात 1989 से आरंभ होती है तब मैं और छोटा भाई अनिल नैनीताल नर्सरी स्कूल में पढ़ते थे। समाचार कार्यालय के नीचे हमारा व महेश जोशी का कमरा साथ है। दोनों कमरों के बीच में दरवाजे का फासला है। जोशी जी की ओर बने दरवाजे [...]
उमेश डोभाल..राजू रावत..गिर्दा का अक्स जीवित है हममे, हर एक में
प्रशान्त राही उमेश डोभाल, राजू रावत और गिरदा भी अब हमारे बीच नहीं रहे। पीछे छोड़ गये हैं वे अपनी अमिट छाप! यादें, ढेर सारे कार्य, अथाह पर सबसे बड़ी बात, मिसालें गजब की। चारों ओर से बंद पुलिस की गाड़ियों में जेल से अदालत और अदालत से फिर जेल आते-जाते सिपाहियों के हाथ में [...]
अथ पौड़ी कथा – 5: अब वो होली कहाँ
बदलाव का असर पौड़ी पर भी पड़ा है। संचार माध्यमों व आधुनिकता की बयार ने यहाँ की रवायतों, संस्कृति व सम्बन्ध तक को धो कर रख दिया है। अब यहाँ के समाज में वह आत्मीयता नहीं दिखती है और न वह परम्पराओं को आगे बढ़ाने को इच्छुक हैं जो वर्षों से चली आ रही थीं। [...]
बरस दीवाली बरसे फाग, जो नर जीवे खेले आज
बरस दीवाली बरसे फाग, जो नर जीवे खेले आज, हो हो होलक रे बरस दीवाली बरसे फाग, जो नर जीवे खेले आज, हो हो होलक रे नैनीताल समाचार के सुधी पाठक, विज्ञापनदाता, सहयोगी, समय से पाठकों तक नहीं पहुँचाने वाला डाक विभाग व तल्लीताल पोस्ट ऑफिस वाले जी रौं लाख सौ बरीस…हो हो होलक रे [...]
बरसे फाग
फिर बसन्त फिर होली आई रस बरसा रंग बिखरा चूनर रंगी, फागुन लहराई कुछ बुरांस कुछ टेसु टपके राख हुए गुलमोहर रंगीले कुछ पलाश डाली से टूटे हवा ले उड़ी स्वप्न सजीले बादल घिर आये मन भीतर बहुत दिनों तक उमेड़े-घुमड़े रुक न सके फिर किसी जतन से फिर-फिर छलके, फिर-फिर बरसे धुल सा गया [...]
एक होली हमारी ओर से
संसद में खेलें एक घड़ी (मथुरा में खेलें एक घड़ी की तर्ज पर) संसद में खेलें एक घड़ी, संसद में खेलें एक घड़ी काहे के सिर पर मुकुट विराजै, काहे के सिर पर है पगड़ी ।। संसद में… ‘सोनिया‘ के सिर पर मुकुट विराजै, ‘मनमोहन‘ के सिर पर है पगड़ी ।। संसद में… काहे के [...]
तब की जैसी होली अब कहाँ…
होली शब्द सुनते ही मन में शरारत और हरारत एक साथ शुरू हो जाती है। रंगों का यह त्यौहार कुछ ऐसा ही है। लेकिन मेरे गाँव की होली तो अजीब थी। हर घर में होली का त्यौहार मिट्टी, गोबर तथा कीचड़ के पानी को एक-दूसरे पर डालकर मनाया जाता था। मुझे लगता है तब गाँव [...]
मेरी स्मृति में ताजा है सतराली की होली
हेम चन्द्र लोहनी मेरा बचपन अल्मोड़ा से 16 मील दूर सतराली में बीता। सतराली की होली प्रसिद्ध थी। बसन्त पंचमी से होली गायन आरम्भ होता था। ढोलक में जौ चढ़ाकर रात्रि में किसी चौपाल में अलाव के आगे होली गाई जाती थी। बच्चे दिन में लकड़ी के बड़े टुकड़े एकत्रित करते। ये गीत वैष्णवपदी होते [...]
बसन्त आ गया है
बसन्त आ गया है। पतझड़ वाले आड़ू-पयाँ के वृक्षों पर नई कोंपल आ गई हैं, लक्-दक् फूल खिल चुके हैं, एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग संग लेकर बसन्त आ गया है। तिड़ा हुआ मुँह फटे हुये पैर भयभीत करती शीतलहर, दुःखों के बाद सुख का ऐहसास एक नया जीवन नया राग-रंग नई उमंग [...]
शराब के प्रचलन ने पहुँचाया होली परम्परा को आघात
बसन्त के आगमन के साथ ही लोगों के जीवन में एक बहार सी आने लगी है। प्रकृति मनों को रिझाने में लगी है। मन में उमंग व उल्लास के भाव जाग रहे हैं। होठों में मधुर संगीत उतर आया है। होली आने में अभी वक्त है लेकिन होली के बोल अनायास होठों पर आने लगे [...]
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