घामतपवे भाबर से साइबर युग में फटक मारता हल्द्वानी – 4
बचीगौड़ धर्मशाला परिसर में बने मंदिर से लगा मटरगली की ओर एक प्याऊ था। उस समय प्याऊ लगाना और धर्मशाला बनाना परोपकार का काम माना जाता था। ऐसे ही एक समाजसेवी परिवार के व्यवसायी राजेन्द्र कुमार जैन बताते हैं कि उनके बुजुर्ग बुलन्दशहर से आकर हल्द्वानी में बसे थे। इनके दादा पूरनमल जैन 1895 के [...]
बागेश्वर में बरसा प्रशासन का डंडा
घनश्याम विद्रोही प्रशासन का डंडा कैसा होता है, यह यहाँ के वासिंदों को पहली बार चला। आम आदमी को छोड़ यदि दूसरे नजरिए से देखें तो यह डंडा चलना भी जरूरी था। प्रशासन का कहर जहाँ अतिक्रमणकारियों पर टूटा, वहीं सालों से सरकार को करोड़ों के राजस्व का घाटा पहुँचा रहे खनन माफियाओं पर भी। [...]
हमें बधाई तो दीजिये !
बधाई आप सबको। नहीं, बड़ा दिन या नये साल की नहीं। वह तो हर साल आते रहते हैं। यह तो खास-उल-खास मौका है….. दरअसल बधाई तो आपने देनी चाहिये थी मुझे। लेकिन आपको खबर हो तभी न आप बधाई देंगे ? बात यह है कि मैं अब ‘पत्रकार’ बन गया। हाँ…..हाँ मैं तो अपने को [...]
मुआवजे को तरसते लोग
प्रवीन कुमार भट्ट देहरादून के चकराता विकासखंड के सीमांत भटाड़ छौटाड़ गाँव के लोग इन दिनों जिलाधिकारी कार्यालय के खूब चक्कर लगा रहे हैं। सुदूर सीमांत गाँव के यह जनजाति लोग इस कार्यालय में किसी प्रकार की जुगाड़बाजी के लिए नहीं आ रहे। स्वभाव से बेहद शांत और मिजाज से शर्मीले यह लोग इस बात [...]
गिर्दा के बाद: गिर्दा की याद–नैनीताल 2011
यह समागम गिर्दा के बहाने ही संभव था। साहित्य, संगीत, रंगमंच और अन्य विविध कलाकर्मों में दखल के साथ ही जनपक्षीय राजनीति में भी सक्रिय रहे गिर्दा ही इनसे जुडे़ उत्तराखंड के महत्वपूर्ण लोगों को साथ जुटा सकते थे। सो ‘पहाड़’ के बैनर तले ये लोग गिर्दा को याद करने 23 और 24 दिसम्बर को [...]
यह कैसा मिशन 2012 है ?
गजेन्द्र नौटियाल सभी राजनैतिक दल मिशन 2012 की बातें और तमाशे में मशगूल हैं पर मुझे समझ नहीं आता कि ये मिशन किसके लिए है और किसका ? ऐसा समझ न आने का कारण भी है और धारणा भी। चलें पहेलियों से इतर कुछ यथार्थ को समझते हैं – वो खेतों के बिजूके- मेरा गाँव [...]
आशल – कुशल
चुनावों की तारीख की घोषणा के साथ ही उत्तराखंड में राजनीतिक हलचल उस दौर में पहुँच गई जहाँ टिकट हासिल करने का घमासान अपने अंतिम दौर में होगा। राज्य में कड़ाके की ठंड के बीच चुनावी वादों की बयार तेजी पकड़ने लगी है। बसपा ने सभी 70 सीटों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित करने का [...]
उन दिनों हमने एक समानान्तर दुनिया के सपने रचे
चौदह दिसंबर की सुबह जब राजीव लोचन साह का मोबाइल पर संदेश आया कि नंदकिशोर भगत नहीं रहे, तो मैं उसकी शक्ल याद करने लगा। इतने दिनों से उसके साथ संपर्क छूटा हुआ था कि मुझे शक्ल तलाशने में वक्त लगा। एक दुबले-पतले इंसान का भारहीन पुतला आँखों के आगे तैरने लगा, जिसे सक्रिय चेहरे [...]
मेरे सारे गुरुओं में सबसे अलग थे….
पिछले एक-दो साल से ऐसा बार-बार होने लगा है कि कुछ-कुछ दिनों बाद किसी न किसी करीबी के बिछुड़ने की खबर मिल जाती है। वैसे तो मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है, मगर अपने किसी भी परिचित, करीबी या आत्मीय की मृत्यु मन को गहरे तक विचलित कर ही देती है। भगत दा का जाना [...]
अथ पौड़ी कथा.11 , आन्दोलनों की धरती-3
1941 में पौड़ी मात्र 1,834 की आबादी का कस्बा था। इसमें ज्यादातर संख्या सरकारी कर्मचारियों व उनके परिजनों की थी। इनके अलावा दुकानदार व अधिवक्ता थे। सन् 1930 के ईबटसन काण्ड के बाद हुए दमन और आन्दोलनकारियों को लम्बी सजायें दिये जाने के कारण स्थानीय लोगों की आजादी के आन्दोलन में भागीदारी कम हो चली [...]
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