सत्तर साल पूर्व दिल्ली की वह होली याद आती है
भगवती प्रसाद नौटियाल देहरादून में बैठे-बैठे मेरे मन में दिल्ली के चाँदनी चौक का लगभग सत्तर वर्ष पुराना वह वैश्य समाज घूम रहा है, जो दिल्ली की आन-बान और शान हुआ करता था…. सन् 1938-42 के दौरान उन होलियों में, मैं अपने कुमाउनी बंधुओं के साथ बिना रंग के भी रंगकर नाचा करता था। मेरे [...]
होली आते ही मन में चुलमुलाट पड़ जाती है!
गंगोलीहाट इलाके में होली के जानकार लोगों को महन्त कहा जाता है। ये महन्त गीत संगीत के विशेषज्ञ माने जाते हैं। ऐसे ही एक महन्त चहज गाँव के तारा दत्त भी हैं, जिन्हें लोक कलाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पारीगाँव तोक में 1928 में जन्मे तारादत्त जी जन्म से ही दृष्टिहीन हैं। मगर [...]
होली अंक के लिए सप्रेम
सम्पादक, ऐसा हो झाडू देवे पानी लावे, चिट्ठी डाले डाक में। अखबारों के पैकट बांधे, रहे लेख की ताक में। नकल-नवीसी करे कलर्की, जमादार सा हाजिर हो। रखवाली रक्खे आफिस की बस, ऐसा सम्पादक हो।। मंगता बनकर मंगा पुस्तकें, समालोचना करता हो। न्याय-तुला को रक्खे ताक में, बेसिर पैर बकता हो। अपनी धुन का [...]
पनघट पर छयल चलो बरछी
होली को कामकाका के अगियाये हुए जीवन का ‘इजर’ समझना चाहिये। पाँच दिनों में फाँणा, काटा, सुखाया और जलाया। इस ऊखड़ मल्याट में रतिकाकी को भी साथ रहना पड़ता है। जिस समय आग धमकी होती है उस समय वह हाथ में हाथ धरे तमाशा नहीं देखती। पानी-पन्यार, नदी-पनघट की सोचती है। आग और पानी के [...]
सौल कठौल : हमार भगतदाक् स्मृति जी रौ लाख सौ बरीस
(विगत दिसम्बर में हमारा साथ छोड़ गये नन्दकिशोर भगत इस होली के लिये पहले ही अपने हिस्से का सौल कठौल लिख कर छोड़ गये।) डेमोक्रेसी के नाम पर मिले, सन् सैतालीस के बाद वाले मौलिक अधिकारों ने, उदिया की साफ सुथरी देह को समय से पहले ही बुढ़ा दिया है। जब वह एक बार बीमार [...]
बगरो बसंत है
(बगरो बसन्त है में इस बार हम कथा सम्राट प्रेमचन्द की एक अल्पज्ञात कहानी ‘कमला के नाम विरजन के पत्र’ का एक अंश दे रहे हैं। पत्र शैली में लिखी इस कहानी में पूर्वी उत्तर प्रदेश की होली का जीवन्त चित्रण है तो विभिन्न सामाजिक स्तरों का विभेद भी। -सम्पादक) मझगाँव प्यारे, ऐसा क्रोध आ [...]
…. उड़त गुलाल लाल भये बादल…….
मोसे चरखा मगा दे मानो सैया हमार मोसे चरखा मगा दे।। आफी कातूँलो आफी बणूलो यही चलौलो व्यौहार।। मोसे चरखा मगा दे।। घागरो स्वदेशी आङड़ो स्वदेशी। पिछोड़ो स्वदेशी हमार।। मोसे चरखा मगा दे।। ओढ़नो स्वदेशी बिछोंड़ो स्वदेशी। स्वदेशी पलङा निवार।। मोसे चरखा मगा दे। विदेशी माल को नाम ना लियो है। स्वदेशी माल को करियो [...]
पद संचालन की दृष्टि से खास है काली कुमाऊँ की होली
जगदीश महर गायन और पद संचालन की दृष्टि से काली कुमाऊँ की होली का अन्दाज अलग हो जाता है। इस इलाके में होली का मतलब है-मौजा ही मौजा। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या महिलायें….. सब होली के खुमार में रहते हैं। चम्पावत जिले के अपने छोटे से गाँव डुँगरी, पट्टी खिलबिती की होली की ढेर [...]
एक विशिष्ठ परम्परा का जन सामान्य में रुपान्तरण
विकृत होते सांस्कृतिक परिवेश के बीच जब कुमाऊँ की होली परम्परा पर नजर दौड़ाते हैं, तो सुखद आश्चर्य होता है। सुखद इसलिए कि एक विशुद्ध परम्परा की गायकी ने यहाँ के लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर लिया और आश्चर्य इसलिए कि शास्त्रीयता की जटिल परम्पराओं की निपट अनभिज्ञता के बीच जिन शास्त्रीय [...]
सुअरों के आतंक से उजड़ रहे हैं गाँव
सोमेश्वर विधान सभा के हवालबाग विकासखंड में पड़ने वाले दौलाघट क्षेत्र के गाँवों में जंगली जानवरों व आवारा पशुओं का आतंक है। हाड़-तोड़ मेहनत के बाद काश्तकार विभिन्न फसलों से अनाज व सब्जी, दालें, मसाले आदि जुटा लिया करते थे। अब यह मुश्किल हो गया है। जानवर सारी फसलें चौपट कर देते हैं। मानव जीवन [...]
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