विजय बहुगुणा के उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के साथ हरीश रावत की बगावत का जो प्रकरण सामने आया है, उसके पीछे दरअसल हर स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास होना है। लोकतंत्र में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं पंचायती राज संस्थाओं का अपने-अपने स्तर पर स्वावलंबी और आत्मनिर्भर होना जरूरी है। लेकिन व्यवहार में अब इसका उल्टा होता है। केन्द्र प्रदेशों का मालिक बन बैठा है और पंचायती राज संस्थायें प्रदेश सरकार की बंधुआ मजदूर। इसी के समानान्तर राजनीतिक दलों की प्रान्तीय इकाइयों की नकेल उनके केन्द्रीय नेताओं के हाथ में चली गई और प्रदेश सरकारें अपने दल के केन्द्रीय नेताओं पर जबर्दस्त रूप से आश्रित होकर केन्द्र की उपनिवेश बन गईं। यदि विधायक दलों को अपने नेता चुनने की पूरी आजादी होती तो आज यह हास्यास्पद ड्रामा देखने को नहीं मिलता।
जहाँ तक हरीश रावत का सवाल है, खेल के मौजूदा नियमों के अनुसार उन्हें उत्तराखंड का ताज नारायण दत्त तिवारी के बदले आज से दस साल पहले ही मिल जाना चाहिये था। लेकिन जोड़-तोड़ की राजनीति में कुछ मजबूत दावेदारों का पार्टी चुनाव टिकट कटवाना उनके लिये भारी पड़ गया। इस तरह के जोड़-तोड़ उनकी फितरत में हैं। 1994 के उत्तराखंड राज्य आन्दोलन में भी उन्होंने आन्दोलनकारियों को छोटे-छोटे प्रतिनिधिमंडलों में राजेश पायलट से मिलवाने दिल्ली ले जाकर आन्दोलन की तीव्रता नष्ट की थी। राजनीति में कभी कोई दाँव कभी ठीक पड़ता है तो कभी उल्टा। शायद कभी उनकी किस्मत ठीक रास्ते पर चलने लगे।