11 दिसम्बर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अण्णा हजारे द्वारा किये गये एक दिवसीय उपवास से दो बातें साफ हुईं। एक यह कि अण्णा हजारे का आकर्षण कम भले ही हुआ हो, अभी टूटा नहीं है। दूसरा, टीम अण्णा रणनीतिक सोच और पेशेवर प्रबंधन में बहुत आगे है। सरे राह ऐसी पंचायत लगा देना जहाँ अपने अहंकार में एक के बाद एक गलतियाँ कर रही कांग्रेस और संप्रग के उसके साथी दलों के अतिरिक्त सारा संसदीय विपक्ष मौजूद हो, कोई साधारण बात नहीं है। एनजीओ कौशल का सर्वश्रेष्ठ इस अभियान में दिखाई दे रहा है। सरकार अब भी यदि इन लोगों के मनमाफिक लोकपाल बिल नहीं लाती तो अपनी कब्र खोद रही होगी।
मगर हमारी नजर में लोकपाल कानून भ्रष्टाचार का कोई सुनिश्चित इलाज नहीं है। एक जर्जर होते मकान को सम्हालने के लिये उतना ही बड़ा एक नया मकान बना देना, ताकि उसके सहारे वह पुराना मकान टिका रह सके, कोई उपाय नहीं है। इलाज यही है कि साठ सालों में हम लगातार केन्द्रीकृत होते गये हैं, अब बिना देर किये विकेन्द्रित शासन की ओर लौटें। 73वें-74वें संविधान संशोधन कानून में तमाम संभावनायें हैं। उसे हर राज्य में हू-ब-हू बल्कि और भी ठीकठाक कर लागू करें, तभी रोजगार की समस्या भी हल होगी और भ्रष्टाचार की भी। यह वैश्वीकरण के बहाने आ रही समस्याओं का भी माकूल जवाब होगा। लोकपाल बिल को लेकर आन्दोलन करने से तो जनता की असीम ऊर्जा का अनावश्यक क्षय हो रहा है।