ओसामा बिन लादेन के रूप में दुनिया के सबसे दुर्दांन्त आतंकवादी के मारे जाने की घटना मनुष्य के साहस और वीरता से अधिक युद्ध और जासूसी के क्षेत्र में तकनीकी विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन यह मानना बचकाना है कि ओसामा के मरने से दुनिया में आतंकवाद खत्म हो जायेगा। यदि हम इस्लामी आतंकवाद की बात भी करें तो जब तक फलस्तीन की समस्या बनी रहेगी और अमेरिका की शह पर इजराइल अरबों का दमन करता रहेगा, इस्लामी आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।
जब तक मनुष्य के किसी जाति या धार्मिक समूह में, सही या गलत, यह धारणा रहेगी कि उसके साथ अन्याय हो रहा है और उसके साथ अन्याय करने वाला इतना ताकतवर है कि उससे प्रत्यक्ष लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, तब तक आतंकवाद का समूल नाश नहीं हो सकता। आतंकवादी जनता के एक बड़े हिस्से में फैले असंतोष का जम कर फायदा उठाते हैं और दिनोंदिन हो रहा तकनीकी विकास उनके काम आता है। दिक्कत यह है कि असंतोष का मूल कारण ढूँढने की रुचि सरकारों की नहीं होती और वे सैनिक ताकत से आतंकवाद को खत्म करने का मुगालता पाले रहते हैं। अपने देश में भी यदि हम कश्मीर अथवा पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या का बुनियादी समाधान नहीं ढूँढेंगे तो इस आतंकवाद से हमें दो-चार होते रहना पड़ेगा। न ही ग्रामीण भारत में बढ़ती आर्थिक विषमता को खत्म किये बगैर माओवाद खत्म होने वाला है। नोएडा में जमीनों के अधिग्रहण के विरोध में जिस तरह किसानों ने प्रतिरोध किया है, वहाँ भी जोर-जबर्दस्ती जारी रखी गई तो माओवाद के लिये एक नई जमीन मिलेगी।