अनेक राज्यों की तरह उत्तराखंड सरकार ने भी जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने की योजना 11 फरवरी से शुरू कर दी है। अटल खाद्यान्न योजना में बी.पी.एल. परिवारों को दो रुपया किलो गेहूँ तथा तीन रु. किलो चावल तथा ए.पी.एल. कार्डधारकों को तीन रु. किलो गेहूँ व छः रु. किलो चावल दिया जायेगा। निश्चित रूप से भाजपा सरकार ने यह लोकप्रिय योजना अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर शुरू की है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का योजना के उद्घाटन में मौजूद होना इस बात की पुष्टि करता है। लेकिन इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महंगाई से पिस रही जनता को इस योजना से कुछ हद तक राहत अवश्य मिलेगी।
मगर वास्तविक सवाल इससे आगे शुरू होते हैं। क्या कुशासन पीड़ित उत्तराखंड की सार्वजनिक वितरण प्रणाली इस लायक है कि यह योजना ईमानदारी से लागू होगी और यह अनाज गरीब के घर तक पहुँचने की बजाय काला बाजार में नहीं पहुँचेगा ? मनरेगा का यथार्थ हमारे सामने है। यदि यह योजना ईमानदारी से लागू होती तो लाखों ग्रामीण गरीबों की जेब में इतना पैसा तो अवश्य होता कि उन्हें इस सस्ते गल्ले की जरूरत ही नहीं होती। इससे भी बड़ी बात यह है कि राज्य बनने के इन दस सालों में ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई है कि इस पहाड़ी प्रदेश में खेती-किसानी मजबूत और आत्मनिर्भर हो। यदि जंगली जानवरों के आतंक, असामान्य वर्षा, भूमि व्यवस्था और ऐसी ही अनेकानेक समस्याओं का समाधान ढूँढते हुए यहाँ के हालात ऐसे बनाये जाते कि ग्रामीण अपने घर में ही इज्जत के साथ आर्थिक रूप से लाभकारी खेती कर पाते तो इस तरह के सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के उपायों की जरूरत ही नहीं पड़ती। मगर हालात इतने खराब हैं कि अब खेत और चूल्हे से चिपकी रहने वाली महिलायें तक पहाड़ की दुस्सह जिन्दगी से घबरा कर गाँवों से पलायन करने लगी हैं।
बीजेपी का हर काम चुनाव का एजेंडा है….. अन्न से लेकर आग तक…।
और चार साल पूरे करने के मौक़े पर भी जो विज्ञापनों में पैसा लुटाया जा रहा है- वो भी चुनाव प्रचार का हिस्सा है।… हवा और पानी बेचने तक की घटिया मानसिकता रखने वाले लोग इस सरकार में दिखाई देते हैं…
कुमार अर्थात्….दिल्ली