पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ ऐसे निर्णय दिये हैं, जिससे न्यायपालिका की गिरती हुई छवि साफ हुई है और उसे पुनः प्रतिष्ठा मिली है। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम को खत्म कर एस.पीएओ. से हथियार वापस लेने, ग्रेटर नोएडा में प्राधिकरण को किसानों से अधिग्रहीत जमीन को वापस करने और आयोडीनयुक्त नमक को खत्म करने के निर्णय ऐसे हैं, जिनसे कहा जा सकता है कि न्यायपालिका से अभी भी आशा की जा सकती है। इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने किसी प्रतिबंधित संगठन से सहानुभूति रखने को वास्तविक अपराध मानने से इन्कार कर दिया था। इसी आधार पर देश की पुलिस राजनीतिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों को निरपराध होने पर भी जेल में ठूँस देती है।
लेकिन इन न्यायिक आदेशों से भारतीय लोकतंत्र को लेकर चिन्ता कम नहीं होती। जिस गाड़ी के तीन पहियों में से सिर्फ एक भाग रहा हो और बाकी दो स्थिर हों, उसे गतिशील कैसे माना जा सकता है ? हमारी विधायिका और कार्यपालिका निष्क्रिय और प्रतिगामी हैं। जिन निर्णयों की बात ऊपर कही गई है, उनके पीछे इतने सशक्त जनान्दोलन थे कि अदालत तक बात पहुँचनी ही नहीं चाहिये थी। न्यायपालिका को अपनी सीमा और क्षमता से आगे जाकर निर्णय देने पड़ेंगे तो लोकतंत्र स्वस्थ नहीं रह सकता।