अल्मोड़ा जनपद के जागेश्वर और सल्ट क्षेत्र से देवदार और बाँज के वृक्षों के कटान की जो खबरें मिल रही हैं, वे बेहद चिन्ताजनक हैं। सत्तर के दशक में जब चिपको आन्दोलन पूरी दुनिया में गूँजा था, तब लगता था कि वृक्षों के अंधाधुंध कटान की बीमारी भारत से चेचक की तरह खत्म हो जायेगी। मगर भले ही वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू हुआ हो या सरकारों ने पर्यावरण के नाम पर खूब शोरगुल किया हो, यह बीमारी अभी काफी गहरे तक मौजूद है। फर्क इतना पड़ा है कि अब सरकारें स्वयं ठेके देकर पेड़ नहीं कटवातीं, बल्कि वे लोग पेड़ काटते हैं जो सरकारें चलाने वाली पार्टियों की बुनियाद में होते हैं और पार्टियों के सरकार में आने का रास्ता तैयार करते हैं। वन कानून भी उसी तरह लागू होते हैं, जिस तरह यह दिखाने के लिये कि देखिये, देश में कानून-व्यवस्था है जेबकतरों को तो सजायें होती हैं और देश के संसाधन बेच देने वालों को सत्ता के शीर्ष पर बिठला दिया जाता है। अपने स्वामित्व की जमीन पर बाँज की एक टहनी काटने पर जेल अथवा जुर्माने की सजा की खबरें प्रायः सुनाई दे जाती हैं। मगर किसी माफिया को सजा हुई हो, ऐसा उत्तराखंड में तो कभी सुनाई नहीं दिया। इन ताजा मामलों में भी अब तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। कहा जा रहा है कि प्रदेश में एक ईमानदार मुख्यमंत्री आ गया है। देखना है कि खंडूरी जी माफियाओं से कैसे निपटते हैं।