मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथि 30 जनवरी रख कर उत्तराखंड निवासियों के मुँह पर करारा थप्पड़लगाया है। फिलहाल वोट के मैदान में मछली बाजार लगाने वालों के कोलाहल में उत्तराखंडवासियों की कराह घुट कर रह गई है, मगर इस एक घटना ने यहाँ के निवासियों को उनकी औकात भी बता दी है कि देश के रहनुमा उनको किस नजर से देखते हैं। सिर्फ बर्फबारी के कारण ही ऊँचाइयों पर मतदान कराना मुश्किल होने की बात नहीं है। इन दिनों अनेक पहाड़ी नगरों में स्कूल बन्द हो जाने से लोग प्रवास पर चले जाते हैं। अनेक उम्रदराज लोग भी स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से गर्म इलाकों में चले जाते हैं। वे सिर्फ वोट देने तो आयेंगे नहीं। अतः मतदान का प्रतिशत निश्चित रूप से गिरेगा। इन कारणों से मुख्यमंत्री खंडूरी की आपत्ति कतई निराधार नहीं थी। मगर मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी आपत्ति दरकिनार कर दी।
वोट की राजनीति से जुड़ा हर व्यक्ति चुनाव में इस तरह व्यस्त हो गया है गोया वही इस बार सत्तानशीं होने जा रहा हो। उसे यह महसूस ही नहीं हो रहा है कि यह भी मुजफ्फरनगर कांड की तरह उत्तराखंड का अपमान है। केन्द्र में कोई कद-काठी वाला उत्तराखंड का नेता रहा नहीं। राजनीति इतनी टुच्ची हो गई है कि भाजपा के खंडूरी यदि कहेंगे कि यह गलत है तो कांग्रेस को यह कहना ही होगा कि नहीं, यही सही है। उत्तराखंड की अस्मिता और स्वाभिमान के मुद्दे पर भी इन दलों में सहमति बनने की गुंजाइश नहीं है। यह प्रकरण अपने आप में स्पष्ट कर देता है कि आज उत्तराखंड कितनी असहाय स्थिति में है।