अरविन्द केजरीवाल के एक बयान पर जबर्दस्त विवाद उठ खड़ा हुआ है। अरविन्द ने कह दिया कि संसद में हत्यारे, बलात्कारी और अपराधी घुस आये हैं। यह हो सकता है कि उन्होंने अपनी बात थोड़ा लट्ठमार ढंग से कह दी हो, लेकिन इस बात में झूठ तो कहीं से कहीं तक नहीं है। मगर उनके इस बयान से तमाम राजनैतिक दल बिफर गये हैं और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाने की बात की जा रही है। अन्यथा एक-दूसरे को गरियाते रहने वाले धुर वामपंथियों से लेकर धुर दक्षिणपंथियों तक सभी रंगों-झंडों के नेता अरविन्द केजरीवाल की लानत-मलामत करने में एकजुट हो गये हैं। गो कि बात राजद्रोह के मुकदमे तक जायेगी नहीं, नेताओं को गीदड़भभकी देने की आदत होती है और अगर यदि गई भी तो इन सांसदों के गले में ही फँस जायेगी। प्रशान्त भूषण ने जब हलफ उठाते हुए कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले एक दर्जन मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट रहे हैं तो उन पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चला दिया गया। प्रशान्त को अब तक जेल चला जाना चाहिये था। लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में फँसे न्यायालय को पिछले एक साल से यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि इस मुकदमे को आगे बढ़ाये तो कैसे ?
हमारी सर्वोच्च संस्थाओं को गंभीरता से सोचना चाहिये कि ऐसी बातें उठ रही हैं तो आखिर क्यों ? क्यों जनता का मोहभंग हमारी विधायिका और न्यायपालिका से हो रहा है ? बेहद गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिये और ईमानदारी से उन कारणों को दूर करने की चेष्टा करनी चाहिये, जिससे विश्वसनीयता का यह संकट खड़ा हुआ है। दिक्कत यह है कि हमारे समाज में गाँव-कस्बों के स्तर से देश के स्तर तक गंभीर चिन्तकों की बेहद कमी हो गई है। जो समझदार हैं, वे असहिष्णुता के इस माहौल में अपनी बात रखने का साहस ही नहीं कर पाते।