सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस निर्णय, जिसमें अदालत ने प्रदेश में भूमि खरीद की सीमा तय करने के लिये बने कानून को निरस्त कर दिया था, पर रोक लगाने से उत्तराखंड आन्दोलनकारियों और सभी प्रबुद्ध लोगों ने राहत की साँस ली है। उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला आते ही भू माफिया की बाँछें खिल गई थीं और जमीन की खरीद-फरोख्त में तत्काल तेजी आ गई थी। बताया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय में उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश हुई वकील रचना श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि प्रदेश में मात्र 12 प्रतिशत ही कृषि भूमि है, जिसकी अनैतिक खरीद को रोकने के लिये यह कानून लाया गया था। इस छोटे और ईमानदार तर्क को अदालत ने स्वीकार कर लिया। सवाल है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय को यह बात क्यों नहीं समझायी जा सकी होगी। जाहिर है कि उस वक्त सरकार की ओर से पैरवी करने वाले लोगों ने जान बूझ कर अपना पक्ष कमजोर ढंग से रखा होगा। उत्तराखंड में ऐसी घटनायें बहुत अधिक हो रही हैं। माफिया और असामाजिक तत्व अनेक तरह से अपने खेल खेल रहे हैं। वर्ष 2003 में अनन्त कुमार सिंह के उच्च न्यायालय से दोषमुक्त घोषित होने के फैसले, जिसे जबर्दस्त जन दबाव के बाद न्यायालय ने वापस ले लिया था, में एक विधायक के भाई, जो सरकारी वकील थे, की भूमिका अत्यन्त आपत्तिजनक थी। अभी पिछले वर्ष एक जल विद्युत परियोजना के निर्माण पर लगी रोक को उच्च न्यायालय को इसलिये वापस लेना पड़ा, क्योंकि सरकारी वकील बहस करने के बदले दायें-बायें झाँकने लगे। बताया गया है कि पीठासीन न्यायमूर्ति ने इस मामले में सरकारी वकील की चुप्पी पर उसे लताड़ा भी। मगर अन्ततः उन्हें विवश होकर स्टे खारिज करना पड़ा। यह बहुत जरूरी है सरकारी वकील सरकार की नीतियों और जनता के हितों का न्यायालय में पूरी ताकत से बचाव करें।