यदि गणतंत्र दिवस मनाना एक कर्मकांड मात्र है तो कोई दिक्कत नहीं है। 26 जनवरी को राजपथ पर होने वाली सलामी और रंगारंग कार्यक्रमों से उसकी पूर्ति हो जाती है। लेकिन यदि हमें इस महादेश की सचमुच चिन्ता है तो यह मानना होगा कि हम बहुत बड़े खतरे में हैं। क्योंकि एक अरब से अधिक लोगों ने जिन्हें बहुत विश्वास के साथ सत्ता सौंपी है, वे अपनी जनता के सगे नहीं हैं। उनकी जवाबदेही अपनी जनता के प्रति नहीं है, बल्कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सत्ता भारत में भी स्थापित हो जाये, यह उनका ध्येय है। उनके इस षड़यंत्र में यदि कोई व्यक्ति छोटी सी बाधा भी उत्पन्न करे तो वे उसे माओवादी घोषित कर जेल की सलाखों से पीछे फेंक देने में जरा सा भी विलम्ब नहीं करते। इस दुष्चक्र में एक-दो नहीं, मुख्यधारा की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ शामिल हैं। चिन्ताजनक बात यह है कि जिस मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी बताया जाता है, वह दरअसल लोक की आँख में धूल झोंकने का प्रभावी औजार बन गया है और जिस न्यायपालिका पर इस लोकतंत्र को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी है, उसने अपनी साख लगभग खो दी है। ऐसे में तत्काल सम्हलना और रास्ता ढूँढना भी दुष्कर हो गया है।
लेकिन बदलाव की आँधियाँ पूरी दुनिया में चल रही हैं। पहले वे लैटिन अमेरिका में थीं। अब यह अंधड़ ट्यूनीशिया में सत्ता बदल के बाद वे मिश्र और बाकी अफ्रीकी देशों में चलने लगा है। क्या भारतीय उप महाद्वीप इस बदलाव से अछूता रह पायेगा ? हमारे सत्ताधारी कह सकते हैं कि भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। हम एक लोकतंत्र हैं और लोकप्रिय जनादेश से सत्ता में आते हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ? 20 रु. रोज से कम में आजीविका चलाने वाले देश के 77 प्रतिशत लोगों में से कोई एक क्या आज राजनीति में किसी निर्णायक भूमिका में है ?