भाजपा के टिकट पर जीते काशीपुर के अकाली विधायक हरभजन सिंह चीमा के इस बयान कि सरकार तराईवासियों की उपेक्षा कर रही है और पहाड़वासी तराई पर बोझ बन गये हैं, एक बबाल पैदा हो गया है। चीमा और तिलक राज बेहड़ जैसे लोग पहाड़ विरोधी उस जहरीले सोच के प्रतिनिधि हैं, जिसने मायावती से उधमसिंह नगर बनवाया और फिर उधमसिंह नगर रक्षा समिति के बैनर के रूप में एक आन्दोलन चलाया, ताकि उत्तराखंड राज्य बनते समय तराई को उत्तराखंड से अलग किया जा सके। ऐसे लोगों के लिये अपना राजनैतिक वजूद कायम रखने के लिये अब भी बीच-बीच में विष वमन करना जरूरी हो जाता है। मगर इन शातिर लोगों से भी ज्यादा हास्यास्पद व्यवहार उन तथाकथित पहाडि़यों का है, जो ऐसे बयानों की प्रतिक्रिया में ‘मैं पीछे क्यों रहूँ’ के सोच के साथ बेमतलब की उछल-कूद मचाने लगते हैं। सबसे मजेदार प्रतिक्रिया उत्तराखंड क्रांति दल की है। पहले भाजपा और इस बार कांग्रेस की गोद में बैठ कर अपना अस्तित्व बर्बाद करने के लिये कृतसंकल्प, एक जमाने के उत्तराखंड के इस प्रतिनिधि राजनैतिक दल को चीमा के बयान से मानो संजीवनी मिल गई है। उत्तराखंड के ज्वलन्त मुद्दों पर कभी भी मुँह न खोलने वाले, यहाँ तक कि श्रीनगर जल विद्युत परियोजना के पक्ष में उत्तराखंड के एक कैबिनेट मंत्री के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर में धरने पर बैठ जाने वाले इस दल के नेताओं ने चीमा के आवास पर जिस तरह तोड़-फोड़ की, उसकी निन्दा ही की जा सकती है। डॉ. भरत झुनझुनवाला के साथ मारपीट, उस मारपीट के अपराधियों का सार्वजनिक अभिनन्दन और अब चीमा के आवास पर तोड़-फोड़; इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि भ्रष्टाचार से आगे बढ़ कर उत्तराखंड की राजनीति में अगला दौर अब घोर गुण्डागर्दी और अराजकता का होगा।