भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। संसद एक हफ्ते से 2 जी स्पेक्ट्रम मामले को लेकर ठप है। महाराष्ट्र के एक मुख्यमंत्री की बलि चढ़ गई, कर्नाटक के एक मुख्यमंत्री की रवानगी होने को है। रतन टाटा देहरादून आकर कह गये कि एक केन्द्रीय मंत्री को रिश्वत देने के बदले उन्होंने एअरलाईन क्षेत्र में प्रवेश न करना उचित समझा। अब बाबा रामदेव ने शोशा उछाला है कि उत्तराखंड के एक मंत्री ने उनसे रिश्वत माँगी थी। प्रदेश के सियासी हलकों में भूचाल आ गया है। लेकिन यह बुनियादी बात कोई नहीं कह रहा है कि धन की बुनियाद पर खड़ी आज की राजनीति के लिये तो ऐसे घोटाले ऑक्सीजन हैं। चाहे उत्तराखंड की जल विद्युत परियोजनायें हों, चाहे गुजरात-महाराष्ट्र के सेज, भारी-भरकम रकम दलाली में ली ही इसलिये जाती है ताकि अगले चुनाव के लिये पार्टी फंड को मजबूत किया जा सके। और चूँकि लक्ष्मी चलायमान है, इसलिये लगे हाथों, जिस जिसको मौका मिले, वह भी अपने हाथ चिकने कर लेता है। मगर सच्चाई यह है कि यह घटिया राजनीति बदले बगैर भ्रष्टाचार का यह दुष्चक्र खत्म नहीं किया जा सकता।
राजनीति में प्रवेश कर रहे बड़बोले कॉरपोरेट योगगुरु रामदेव क्या इस धनबल के बगैर सफलता हासिल कर सकते हैं ? आज की राजनीति में आप क्षेत्र के सबसे ईमानदार और कर्मठ व्यक्ति को खड़ा कर दीजिये, यदि उसके पीछे किसी पार्टी का बैनर नहीं है या पानी की तरह पैसा बहाने के लिये नहीं है तो वह अपवादस्वरूप ग्राम प्रधान भले ही बन जाये, सांसद या विधायक तो नहीं ही बन सकता। महात्मा गांधी ने संसद को ‘बाँझ और बेसवा’ यों ही नहीं कहा था। इस लोकतंत्र को प्रभावी बनाने के लिये पैसे का प्रभाव खत्म होना चाहिये।