मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय को उत्तर प्रदेश की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाया जाना न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि चिन्ताजनक भी है। इस फैसले की जितनी भी निन्दा की जाये, कम है। सीमा आजाद 5 फरवरी 2010 को दिल्ली के पुस्तक मेले से झोला भर किताबें खरीद कर इलाहाबाद लौट रही थीं तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और मार्क्स, लेनिन और चे ग्वेवारा की पुस्तकों को माओवादी साहित्य बता कर जेल भेज दिया। तब से वे जेल में ही थीं। उन्हें जमानत नहीं दी गई और अब आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई है। जिस प्रदेश में हत्यारे और बलात्कारी न सिर्फ बेखौफ घूमते हों, बल्कि सत्ता का भी उपभोग करते हों, वहाँ एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को उम्रकैद होना आश्चर्यजनक और हास्यास्पद है। न कहीं कोई हथियार उठा, न एक कतरा खून का बहा और सजा उम्रकैद की सुना दी गई। पुलिस का चरित्र तो अब ढँका-छिपा नहीं रहा है। मगर अदालतों द्वारा पुलिस के दबाव में आकर इस तरह के फैसले देने की घटनायें हाल के सालों में ही बढ़ी हैं। इससे पहले विनायक सेन के मामले में भी छत्तीसगढ़ सरकार का ऐसा ही रुख रहा। अन्ततः उन्हें सर्वोच्च अदालत से जमानत मिल पाई। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से हमारी सत्ता क्यों इतना खौफ खाती है, यह बात समझ से परे है। लेकिन उसे समझना होगा कि इस तरह के दमन से देश में हथियारबन्द प्रतिरोध ही बढ़ेगा और देश जिस गृहयुद्ध की आग में जल रहा है, उसकी लपटें और अधिक तेज होंगी। दमन किसी समस्या का इलाज नहीं हो सकता। वह बीमारी को और अधिक बढ़ायेगा।