इस महीने हमने एक अद्भुत परिघटना देखी। अण्णा हजारे के जन लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर जितने सारे लोग सड़कों पर उतर आये, वह इससे पूर्व भारत में कभी नहीं हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में भी नहीं। शायद इसके पीछे खेत-खलिहान से लेकर किचन-बेडरूम तक व्याप्त उस मीडिया की बड़ी भूमिका रही, जिसकी आजादी से पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। एक महत्वपूर्ण बहस भी चली कि जनता बड़ी है कि संसद। अब लोकतंत्र में तो जनता ही सर्वोच्च होती है। चूँकि एक अरब से ज्यादा लोग सीधे जाकर संसद में नहीं बैठ सकते तो आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के रास्ते अपने प्रतिनिधि वहाँ भेज देते हैं। मगर जब ये लोग संसद में जाकर अपनी जनता के प्रतिनिधि न रहें, अपनी पार्टियों के बंधुआ मजदूर और कॉरपोरेट घरानों के दलाल हो जायें तो जनता क्या करे ? ऐसे में जनता सड़कों पर आयी और सांसदों को मुँह की खानी पड़ी तो अच्छा ही रहा।
जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार मिटाने का कोई रामबाण इलाज नहीं है। जब तक समूची सरकारों को ही निगल जाने वाले कॉरपोरेट घरानों, जनता को लगातार गुमराह करने वाले मीडिया और जनता की लड़ाई को भटका देने वाले एन.जी.ओ. को लोकपाल के दायरे में नहीं लाया जाता, यह कानून अधूरा ही रहेगा। मगर जिस तरह ‘सूचना का अधिकार कानून’ ने सरकार-प्रशासन के भीतर भ्रष्टाचार को लेकर एक डर पैदा किया है, यह कानून भी यदि ठीक से बना और ईमानदारी से लागू किया गया तो सरकार-प्रशासन को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने की दिशा में अगला कदम होगा। एक ओर चिन्ता की बात यह रही कि इस अभियान में शामिल हुए अधिकांश लोग भीड़ बन कर ही रह गये, सचेत और प्रतिबद्ध आन्दोलनकारी नहीं बन सके और इस दृष्टि से यह सत्तर के दशक में जे.पी. के नेतृत्व में चले आन्दोलन से बहुत पीछे रह गया। दूसरी ओर इस घटना ने इस भ्रान्ति को तोड़ा कि आज का युवा देश और राजनीति से कतई बेपरवाह है। उस लिहाज से अभी सम्भावनायें जीवित हैं।