अन्ततः वही हुआ, जिसकी आशंका थी। उत्तराखंड क्रान्ति दल दोफाड़ हो गया। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पँवार एक तरफ हो गये और भाजपा सरकार में मंत्रिपद पर आसीन दिवाकर भट्ट दूसरी तरफ। फिलहाल ऐसा लगता भी नहीं कि अब इनमें किसी तरह का एका होगा। उत्तराखंड के अधिकांश हितैषियों को इस घटना से झटका लग सकता है। लेकिन बात ऐसी है नहीं। दिवाकर भट्ट के अलग हो जाने से पार्टी अब पहले से ज्यादा मजबूत भी हो सकती है, यदि उसके नेता अपने पिछले निर्णयों और व्यवहार के लिये जनता से माफी माँगें, ठेकदार और दलालों के वर्चस्व से पार्टी को मुक्त करायें, तृणमूल स्तर पर संगठन को मजबूत करें तथा प्रदेश भर में घनिष्ठ जन सम्पर्क कर एक आक्रामक आन्दोलन का सूत्रपात करें। यदि यह हो सके तो भले ही 2012 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद एक मजबूत विपक्ष न बन सके, उसके विधायकों की गिनती आज से ज्यादा ही होगी। उक्रांद लगभग इसी रूप में पहले भी दोफाड़ हो चुका है। उक्रांद के थिंक टैंक कहे जाने वाले बिपिन त्रिपाठी ने अपने जीते जी दिवाकर भट्ट को दुबारा पार्टी में वापस नहीं आने दिया था।
यह आसान काम नहीं है। उत्तराखंड क्रांति दल का नेतृत्व श्रीहीन हो गया है। जमीनी संघर्ष की इच्छाशक्ति उसमें नहीं बची। राज्य आन्दोलन के पहले के उसके नेता और कार्यकर्ता थक गये हैं और छोटी-मोटी सुख-सुविधाओं की आकांक्षा रखते ही हैं। चिन्ताजनक बात यह है कि जनता में सम्मानित कुछ शीर्षस्थ नेता सबसे बना कर चलने में विश्वास करते हैं। उनमें से तो कुछ ने अपनी स्थिति अब तक साफ नहीं की है कि वे किस तरफ हैं। इस चुप्पी से पार्टी का निचले स्तर का वह कार्यकर्ता भी असमंजस में है, जो अपने विश्लेषण से मान रहा है कि पँवार ने निर्णय तो सही लिया, मगर गलत तरीके से।