उत्तराखंड में इस वक्त उन्माद का माहौल है। विवेक का गला भिंचा हुआ है। 1990-92 के दौरान जैसी स्थिति बाबरी मस्जिद को लेकर देश भर में थी, लगभग वैसी ही स्थिति बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर उत्तराखंड में है। उस वक्त मीडिया साम्प्रदायिक भावनाओं में बह कर ‘सरयू का पानी खून से लाल’ किये दे रहा था, इस वक्त वह हानि-लाभ का गणित लगा कर विज्ञापनों की लाईफलाइन, बड़ी कम्पनियों के साथ खड़ा होकर ‘विकास’ का पैरोकार बन गया है और ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों द्वारा मुख्यमंत्री की गद्दी पर बिठलाये गयेविजय बहुगुणा के साथ कदमताल कर रहा है। इन परियोजनाओं द्वारा ‘रोजगार’ सृजित होने के भ्रम में पड़े नौजवानों का उन्माद सोशियल साइट्स, जहाँ नये-नये तोगडि़या पैदा हो गये हैं, पर मारो-काटो के कोलाहल के साथ मुखरित हो रहा है। भरत झुनझुनवाला के साथ बाँध समर्थकों के गुण्डों द्वारा की गई बदसलूकी को एकदम जायज करार देते हुए उनके मकान पर चट्टान लुढ़का देने से लेकर तमाम ‘बांग्लादेशियों’ और ‘नेपालियों’ जैसे बाहरी तत्वों को भी प्रदेश से बाहर खदेड़ देने का आह्वान ‘फेसबुक’ पर किया जा रहा है। गनीमत है कि पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को खदेड़ देने की आवाज अभी नहीं सुनाई दी है।
तमाम विवेकशील लोग यह समझा पाने में भी समर्थ नहीं हो पा रहे हैं कि सरला बहन और स्वामी मनमथन भी ‘बाहरी’ लोग ही थे। वे कहीं कोशिश कर भी रहे होंगे तो कहीं सुनाई नहीं दे रहा है, क्योंकि मीडिया इस वक्त उनकी समझदारी की बातों को तरजीह देने के मूड में कतई नहीं है। लेकिन कहना तो होगा ही, भले ही उसमें कितने ही खतरे क्यों न हों और अपनी बात पहुँचाने का कोई नया तरीका ही क्यों न ढूँढना पड़े। अन्यथा इस शिशु प्रदेश के हिंसा की आग में झुलसने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।