स्वामी रामदेव के बच जाने और स्वामी निगमानन्द के शहीद हो जाने के बाद देश और प्रदेश की राजनीति का कुरूप चेहरा और अधिक स्पष्ट होकर सामने आया है। इन घटनाओं ने बेहयाई और संवेदनशून्यता की सारी हदें पार कर दी हैं। दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ, भाजपा और कांग्रेस, इन घटनाओं के बहाने एक दूसरे पर निशाना साध रही हैं। भाजपा रामदेव के अनुयायियों पर लाठीचार्ज को ‘जलियाँवाला बाग’ घोषित कर रही है तो कांग्रेस निगमानन्द की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु को भारतीय जनता पार्टी के नाकारापन से जोड़ कर देख रही है।
इस बेमतलब की बहस में असली मुद्दे लापता हो गये हैं। ये दोनों दल न भ्रष्टाचार व काले धन की बात कर रहे हैं और न अवैध खनन के रूप में गंगा को बर्बाद करने की। अनावश्यक गाली-गलौज की यह स्थिति इन तथा इन जैसे मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों के लिये अत्यन्त मुफीद है। अन्ततः इनकी राजनीति इस काले धन पर ही तो फल-फूल रही है। खनन माफिया हो, भू माफिया हो या विकास कार्यों की ठेकेदारी करने वाला माफिया, पूरे देश की राजनीति को यही लोग संचालित करते हैं और जब जनता की ओर से प्रतिरोध होते हैं तो एक-दूसरे के खिलाफ गत्ते की तलवारें भाँजते हुए कोशिश करते हैं कि जनता से सच्चाई छिपाये रखकर उसे किसी बड़े जनान्दोलन से विरत रखा जाये। कठिनाई यह है कि वैकल्पिक राजनीति का कोई स्पष्ट खाका नहीं बन पाया है। अतः जनता जानते-समझते हुए भी बेवकूफ बने रहने के लिये अभिशप्त है।
mai indian hu par mere pass sarkar ne koi pruf nahi diya na mai lena chahata hu kayoki mai jab aapani sefty ke leye poilise station phon kiya to koi uttar nahi mila es liye mai sochane par majbur ho gaya ki jab sarkar ya sakari aadami meri kadra nahi karata to hame yah adhikar lekar kya fayada
ratnakar mishra
villege post pipra ramdhar
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