भ्रष्टाचार की दिनोंदिन लंबी होती फेहरिस्त में अब गृह मंत्री पी. चिदम्बरम का नाम उछलने से बहतु सारे लोग भौंचक्के हो सकते हैं, लेकिन इस घटना पर आश्चर्य करने की कोई जरूरत नहीं है। 20 वर्ष पूर्व आर्थिक उदारीकरण का जो रास्ता हमने अपनाया उसने देश की पूरी तरह केन्द्रीकृत सत्ता व्यवस्था के साथ मिल कर ऐसा ही परिणाम पैदा करना था। अण्णा हजारे के आन्दोलन के बहाने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चिन्ता और बेचैनी का एक माहौल बना है, मगर इस बुराई की जड़ में जाने के गंभीर प्रयास बहुत कम हो रहे हैं।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि जून 1991 में सम्पन्न लोकसभा चुनाव से कुछ सप्ताह पूर्व ही फ्रांस के ‘ला मोंद’* अखबार ने लिख दिया था कि मनमोहन सिंह भारत के अगले वित्तमंत्री होंगे। तब मनमोहन सिंह किसी तरह की राजनीति में सक्रिय नहीं थे। मगर विश्व बैक को अपने पूर्व कर्मचारी मनमोहन सिहं को वित्तमंत्री बना कर भूमंडलीकरण का एजेंडा लागू करवाना था, जिसमें पार्टियों का होना न होना महत्वहीन था। उस चुनाव में नरसिंहाराव भारत के प्रधानमंत्री बने और मनमोहन सिंह को राज्यसभा में लाकर वित्तमंत्री बना दिया गया। सरकार यदि अटल बिहारी वाजपेयी की बनती तो उन्हें भाजपा में शामिल कर वित्तमंत्री बनाया जाता। अपने शालीन स्वभाव और विवादरहित छवि के कारण मनमोहन सिंह बाद में देश के प्रधानमंत्री बन गये, लेकिन जिस रास्ते पर वे देश को ले गये वह विनाशकारी है। चिदम्बरम तो उड़ीसा में पर्यावरण का विनाश कर रही विवादास्पद कम्पनी ‘वेदान्ता’ के निदेशक मंडल में भी रह चुके हैं।
*Le Monde (French pronunciation: [lə mɔ̃d]; English: The World) is a French daily evening newspaper owned by La Vie-Le Monde Group and edited in Paris. It is one of two French newspapers of record, and has generally been well respected since its first edition under founder Hubert Beuve-Méry on 19 December 1944. It was founded at the request of General Charles de Gaulle after the German army was driven from Paris during World War II, and took over the headquarters and layout of Le Temps, which was the most important newspaper in France before but whose reputation had suffered during the Occupation.[2] Beuve-Méry reportedly demanded total editorial independence as the condition for his taking on the project.