राजकीय शिक्षक संघ, प्राथमिक संघ एवं जूनियर हाईस्कूल शिक्षा संघ की नैनीताल जनपदीय कार्यकारिणी के सहयोग से रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा 26, 27 दिसम्बर 2009 को रामनगर में शिक्षा के सवालों पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. अनिल सद्गोपाल ने कहा ‘शिक्षा अधिनियम 2009’ शिक्षा के अधिकार को छीनने वाला कानून है। यह बाल विरोधी तथा शिक्षक विरोधी है। इससे समाज में असमानता तथा भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा तथा शिक्षा में निजीकरण की गति तेज होगी। यह कानून हमारे संविधान में मुक्त बाजार और नव उदारवादी नीतियों का खुला हस्तक्षेप है। सुप्रीम कोर्ट के 1993 में दिए गए उन्नीकृष्णन फैसले से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का मूल अधिकार प्राप्त हो गया था, उसे सरकार ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए सीमित कर 6 वर्ष तक के बच्चों से पूर्व प्राथमिक शिक्षा का अधिकार छीन लिया है। ‘शिक्षा अधिनियम 2009’ बहुपरती शिक्षा को स्थायी बनाने के लिये लाया गया है। फलस्वरूप लगभग 18 करोड़ बच्चों को घटिया और उबाऊ शिक्षा मिलती रहेगी। दूसरी ओर स्कूली शिक्षा कॉरपोरेट जगत के लिए मुनाफे का सौदा बन जायेगी। इस अधिनियम में नियमित शिक्षकों के संवर्ग को समाप्त करने का प्रावधान है। आगे भी उन्हें जनगणना, चुनाव और आपदा राहत के कामों में लगाये जाने की व्यवस्था है। समान स्कूली शिक्षा प्रणाली पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए शिक्षकों को समाज के अन्य वर्गों के साथ मिलकर संघर्ष करना पड़ेगा। उन्होंने इस कानून का विरोध करने के लिए आगामी 25 फरवरी को अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच के नेतृत्व में दिल्ली में होने वाली रैली में भाग लेने के लिए शिक्षकों सहित समाज के हर वर्ग से अपील की।
’भूमण्डलीकरण के दौर में शिक्षा’ विषय पर बोलते हुए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के डॉ. प्रशान्त शुक्ला ने कहा कि आज शिक्षा एक ओर महंगी हुई है तो दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं से दूर हुई है। यह बच्चे को मशीन के रूप में विकसित कर रही है। इसने समाज में असमानता को बढ़ाया है तथा सृजनशीलता को खत्म किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर राधिका मेनन ने कहा कि सरकार प्रचार कर रही है कि निजीकरण और विदेशी पूँजी निवेश के अतिरिक्त शिक्षा में गुणवत्ता लाने का कोई विकल्प नहीं है। लेकिन सवाल सरकार की नीयत का है। कॉरपोरेट घरानों और उद्योगों को 2009 के बजट में 4,18,095 करोड़ रुपये की कर माफी दी गई है, जो कुल कर संग्रह की लगभग 69 प्रतिशत है। प्रारम्भिक शिक्षा, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और आईसीडीएस जैसे कार्यक्रमों के बजट से अधिक वृद्धि पुलिस तंत्र के बजट में हुई है। शिक्षा से ज्यादा जनता में नियंत्रण सरकार की प्राथमिकता हो गई है। उन्होंने कहा कि भूमण्डलीकरण के प्रभाव में सरकार अपनी लोक कल्याणकारी भूमिका से पीछे हट रही है।
इस अवसर पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल की स्मारिका ‘शैक्षिक सरोकार’ का विमोचन भी किया गया। इसके बाद नन्दकिशोर हटवाल ने रचनात्मक शिक्षक मण्डल के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्राथमिक से डिग्री स्तर तक के सभी शिक्षकों की सृजनशीलता को जनपक्षीय आयाम देते हुए बच्चों के हित में प्रयोग करने हेतु प्रोत्साहित करने का एक मंच है। कार्यशाला की अध्यक्षता प्राथमिक शिक्षक संघ की नैनीताल जिलाध्यक्षा देवकी पाण्डे ने तथा संचालन राजीव जोशी और कपिलेश भोज ने किया। नवेन्दु मठपाल ने सभी का स्वागत किया।
दूसरे दिन उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था पर राजकीय शिक्षक संघ के नैनीताल जिलाध्यक्ष डॉ. महेश बवाड़ी द्वारा एक दस्तावेज पेश किया गया, जिसमें कहा गया कि सरकारें शिक्षा की ढाँचागत जरूरतों पर ध्यान देने के बदले अपनी कमियों को छिपाने के लिए शिक्षकों पर हमले तेज करती जा रही है। उत्तराखण्ड में 25 हजार से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं, मगर सरकार 3,600 शिक्षकों को सरप्लस घोषित कर रही है। हाईस्कूलों में 12 शिक्षकों की संख्या को घटाकर सात कर दिया गया है। निजी स्कूलों पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा रहा है। उपस्थित प्रतिभागियों के साथ-साथ शिक्षाविद् अनुवादक बिपिन शुक्ला ने भी शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत रखी।
यह तय किया गया कि 30 जनवरी 2010 तक सभी जनपदों में रचनात्मक शिक्षक मण्डल की इकाइयाँ गठित की जायेंगी व शिक्षा अधिनियम 2009 पर गोष्ठियाँ आयोजित करवायी जायेंगी। अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच के आह्वान पर 24 फरवरी को संसद पर होने जा रही रैली में सक्रिय भागीदारी की जायेगी। भगतसिंह जन्मदिन व शहादत दिवस, प्रेमचन्द जन्मदिवस, श्रीदेव सुमन शहादत दिवस, चन्द्र सिंह गढ़वाली जन्म दिवस, राहुल सांकृत्यायन जन्म दिवस इत्यादि तिथियों को प्रत्येक जनपद में मनाया जायेगा। मण्डल का केन्द्रीय कार्यालय पिथौरागढ़ में होगा। शिक्षकों के सृजनशील प्रयास व अनुभवों को एकत्र किया जायेगा तथा बच्चों के लिए रचनात्मक विकास कार्यशालाओं का आयोजन किया जायेगा। रचनात्मक शिक्षक मण्डल की आगामी वार्षिक कार्यशाला सितम्बर-अक्टूबर 2010 में रुद्रप्रयाग/चमोली जनपद में होगी।
इसके अतिरिक्त प्रस्ताव पारित किये गये कि शिक्षा को लाभ अर्जित करने का साधन बनने से रोका जाये। शिक्षा पूरी तरह राज्य का दायित्व हो। इसके लिये सरकारों को पर्याप्त धन की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि शिक्षा संसाधनों की दीनता से मुक्त हो सके। राज्य के सभी विद्यालयों में एक समान पाठ्यक्रम लागू किया जाये। शिक्षा विभाग में रिक्त सभी पदों को पूर्णकालिक रूप में भरा जाये। शिक्षा का माध्यम राजभाषाओं को बनाया जाये। स्कूलों को कोठारी आयोग की संस्तुति के आधार पर ‘पड़ोस के स्कूल’ के रूप में स्थापित किया जाये, जहाँ बिना किसी भेदभाव के समाज के सभी वर्गों के बच्चे एक साथ एक समान शिक्षा प्राप्त कर सकें।