खेती पर निर्भर पहाड़ के जीवन पर इस साल मौसम की बहुत बुरी मार पड़ी। पिछले साल बर्फ न पड़ने तथा बहुत कम वर्षा के कारण रबी की खेती चौपट रही। अभी जाड़े की फसलें बटोरी जा रही हैं। उनमें भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है। जोशीमठ के ऊँचे क्षेत्र में जाडे़ की फसलें हैं, आलू और राजमा इत्यादि दालें। इस साल जिसने दो बोरे आलू के बीज बोए, उसकी पैदावार हुई आधा बोरा। जितना बोया उसका चौथाई! इस कमी के कई कारण थे। सबसे पहला था जंगली सुअरों का उत्पात, जिनके झुंड के झुंड रात को आ खेत खोद आलू खा कर चले जाते। किसान यदि उन्हें भगाने जाते तो वे उन पर हमला करने आते। जंगली सुअरों से आलू की खेती बचाने का कोई उपाय नहीं था। कम उपज का दूसरा कारण था रासायनिक खाद का दुष्प्रभाव। चालीस एक साल पहले जब सरकार ने यहाँ के किसानों को आलू की खेती के लिये प्रोत्साहित किया, तो रासायनिक खाद भी सस्ते दामों पर सरकारी गोदामों से बेचनी शुरू की। सरकार ने यहाँ एक आलू फार्म भी खोला, जहाँ से बीज का आलू किसानों को बेचा जाने लगा।
आरंभ में रासायनिक खादों की सहायता से बहुत अच्छी फसलें हुईं। कइयों को एक बोरे बीज से 25 बोरे उपज हाथ लगी। लेकिन कुछ समय बाद यह घटने लगी। रासायनिक खाद के लगातार प्रयोग से भूमि सूखने लगी। उसमें नमी नहीं रही। अब यहाँ की नदियाँ पनबिजली बनाने के लिये सुरंगों में डाली गई हैं और वातावरण की आद्रता और भी कम हो रही है। बिना नमी के मिट्टी सूख रही है, जिसके कारण उपज घट रही है। यहाँ श्री बदरीनाथजी के नीचे लामबगड में गंगा की मुख्यधारा अलकनंदा को विष्णुप्रयाग में एक बड़ी सुरंग में डाला गया है। बिजली बनानेवाली जे.पी. कंपनी ने लगभग सारा पानी सुरंग में डाल लिया है और जो छोड़ा है वह नदी-पाट के पत्थरों के बीच दिखाई भी नहीं देता। नियमानुसार कंपनी को एक-तिहाई पानी नदी में छोडना चाहिए था, लेकिन उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय 600 किमी दूर दिल्ली में है। उसके अधिकारी यह देखने कि कितना पानी नदी में छोड़ा गया है, न कभी देखने आए, न भविष्य में कभी आयेंगे। कंपनी जितना अधिक पानी लेगी, उतनी अधिक बिजली बनाएगी और उतना ही मुनाफा कमायेगी।
दूसरा उत्पात यहाँ भालू का रहा। जोशीमठ क्षेत्र में उसने हाल में 14 लोगों को घायल किया, जिनमें एक की मृत्यु हो गई। मनुष्यों पर ही नहीं, उसने गाय-बैलों पर भी आक्रमण किया और कुछ को वह खा भी गया। लोग सोचते थे कि भालू शाकाहारी होता है, मांसाहारी नहीं। यह गलत साबित हुआ। जब भूखा होता है तो पशुओं को मार कर खा लेता है। जाड़ों में अपनी कंदरा में तीन महीने या अधिक सोने से पहले उसे खूब सारा खाने की आवश्यकता होती है। यह समय उसकी लंबी अवधि तक सोने की शुरुआत है। कुछ माह पहले उसने यहाँ लगाई मकई की फसलों को खाना शुरू किया। मकई को वह खाता ही नहीं, पूरा खेत रौंद डालता है। इस बार भालू अकेले नहीं थे। दो ऐसे थे जिनके साथ बच्चे भी थे यहाँ सैकड़ों साल पूर्व ऊपर पहाड़ से पिघलती बर्फ के लाए बहुत बडे शिलाखंड हैं, जिनके बीच गुफायें हैं। ये गुफायें भालुओं का निवास हैं। पिछले महीने से भालू भोजन ढूँढने केवल रात को ही नहीं घूमते दिखाई दिए, दिन में भी रास्तों पर मिले। उन्होंने अधिकांश हमले दिन में ही किए और अधिकतर स्त्रियों पर। जंगल में भोजन न पाने से रातों में घूमते रहे। पिछले साल तक वे मकई के साथ पेड़ों पर लगे सेब भी खा जाते थे। इस साल बर्फ न पड़ने के कारण एक भी दाना सेब का नहीं हुआ और भालुओं को पेड़ों से फल नहीं मिले। तब उन्होंने राजमा तथा दालों की फसलों को खाना शुरू किया और खेतों को खाली कर दिया।
गाँव के गाँव वन विभाग के पास इन जंगली जानवरों के उत्पातों की शिकायतें लेकर गए। विभाग ने उनको पटाखे बाँटे और कहा कि रात को विस्फोट करें ताकि जानवर भाग जायें। उससे कुछ भी फायदा नहीं हुआ। विस्फोटकों की आवाजें सुन कर जानवर पास ही कहीं दुबक गये और सुबह किसानों को अपने खेत खाये जाने के बाद बर्बाद मिले। जानवरों के किए नुकसान से बचने के लिये किसानों को बचाव का कोई रास्ता नहीं मिला। अन्य दो छोटे बदलाव भी पर्यावरण में यहाँ इस साल आये। हवा में नमी की कमी के कारण ओस नहीं पड़ी और पाला नदारद रहा। पिछले साल तक सीढ़ीनुमा खेतों के ऊपरी भाग, जहाँ धूप नहीं आती थी, सुबह पाले की सफेद चादर ओढ़े रहते थे। इस साल अभी तक पड़ी कड़ाके की ठंड में भी न खेतों और न सड़कों पर, कहीं भी पाला नहीं दिखाई दिया। यह हवा में नमी न होने के कारण हुआ। यहाँ की नदियों का पानी सुरंगों में डालने के कारण वातावरण में नमी नहीं रह गई है। इसके कारण अब धीरे-धीरे जंगलों में पेड़ सूखने लगेंगे और मरुस्थल जैसी दशा बनने लगेगी। पाले के गायब होने को अभी तक किसी वैज्ञानिक तो दूर, सामान्य ग्रामीण ने भी महसूस नहीं किया है।
अभी हाल में अमेरिका के नेब्रास्का विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिमी हिमालय में हिमनद (ग्लेशियर) घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। उस रपट का उल्लेख भारत में भी हुआ और कहा जाने लगा कि चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हिमालयी हिमनद ठीकठाक हैं और उनसे नदियों को पानी मिलता रहेगा। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि 1980 में कराकोरम, जहाँ विश्व की दूसरी सबसे ऊंची चोटी के-2 है, में 87 ग्लेशियरों में हिम का जमाव अधिक हुआ है। यह आकाश से लिए गए चित्रों के आधार पर कहा गया है और बहुत ही भ्रांतिपूर्ण समाचार है। दुनिया भर में कहा जा रहा है कि विश्व का तापमान बढ़ने के कारण हिमालयी हिमनद तेजी से पिघल कर समाप्त हो रहे हैं, जिसके कारण भारत, चीन तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देशों, जिनका जीवन उनसे निकलती नदियों के पानी पर निर्भर है, खतरे में पड़ रहा है।
उत्तराखंड भी पश्चिम हिमालय में पड़ता है और यहाँ हिमनद भयंकर रूप से घट रहे हैं। इसे जानने आकाश से लिए चित्रों की आवश्यकता नहीं है। गंगा के उद्गम गोमुख, जहाँ अभी भी हजारों यात्री प्रतिवर्ष जाते हैं, को देखिये। यहाँ ग्लेशियर 17 मील पीछे हट गया है, और लगातार हटता ही जा रहा है। उत्तराखंड के हिमालय में सभी हिमनद घट कर समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। कुछ ही वर्षों में उत्तराखंड में इनके घटने से पानी का बड़ा संकट उपस्थित हो जाएगा और यहाँ से निकलने वाली नदियाँ, जो गंगा-जमुना की बहुत बडी उर्वरा घाटी को जीवन देती हैं, सूखने लगेंगी। देश का यह भाग मरुस्थल बनने लगेगा। इस समस्या पर अधिक विचार नहीं किया जा रहा है। जो लोग सोचते हैं कि यह समस्या अभी बहुत दूर है, वे गलती पर हैं।