सीताराम बहुगुणा
उत्तराखंड में मतदान की तिथि 30 जनवरी घोषित होने के बाद जहाँ राज्य का सियासी पारा गर्म है, वहीं बर्फबारी और ठंड से अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र में जनजीवन अस्तव्यस्त है। हाड़ कंपाती इस ठंड के बीच चुनाव प्रक्रिया जारी है। कई प्रत्याशियों ने बर्फबारी के बीच ही नामांकन करवाया। स्वयं मुख्यमंत्री खंडूरी बर्फ में पाँच किमी पैदल चलकर नामांकन के लिए पौड़ी पहुँचे। पिथौरागढ़ में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल के नामांकन में जा रही एक जीप के ऊपर भूस्खलन के कारण चट्टान गिरने से दस कार्यकर्ताओं की मौत हो गयी। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा जनवरी में चुनाव कराने के फैसले पर नाराजगी देखी जा रही है। दिल्ली में बैठे लोगों की उत्तराखंड के बारे में जानकारी और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उत्तराखंड की हैसियत को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में उत्तराखंड में जनवरी महीने में कभी मतदान नहीं हुआ। इस निर्णय ने राजनीतिक दलों, चुनाव कर्मियों एवं जनता को मुसीबत में डाल दिया है। इसे चुनाव आयोग का तुगलकी फरमान न कहें तो और क्या कहें कि गोवा में जहाँ इन दिनों अच्छा मौसम है, वहाँ 3 मार्च को मतदान होना है और शीत लहर से जूझ रहे उत्तराखंड में 30 जनवरी को। क्या गोवा में 30 जनवरी और उत्तराखंड में 3 मार्च को मतदान नहीं कराया जा सकता है ? गौरतलब है कि पाँच राज्यों, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मिजोरम एवं गोवा में हो रहे चुनावों की मतगणना एक ही दिन 6 मार्च को होगी।
चुनाव आयोग का यह फैसला ये बात दर्शाता है कि दिल्ली में बैठे लोगों की दृष्टि में उत्तराखंड की कोई हैसियत नहीं है। एक समुदाय के त्यौहार को देखते हुए चुनाव आयोग ने उ.प्र. में मतदान की तारीख चार फरवरी के स्थान पर तीन मार्च कर दी, मगर चुनाव तिथि परिवर्तित करने के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के अनुरोध को अत्यन्त बेरहमी से अस्वीकार कर दिया। जब चुनाव परिणाम 6 मार्च को ही आने हैं तो चुनाव आयोग को चुनाव कराने में इतनी जल्दबाजी करने की क्या जरूरत थी ? क्या बिशन सिंह चुफाल के नामांकन में जा रहे 10 लोगों की मौत की जिम्मेदारी चुनाव आयोग लेगा ? यदि मौसम का यही हाल मतदान की तिथि तक रहा तो इसका प्रतिकूल प्रभाव मतदान पर पड़ना तय है। पहाड़ में मतदान के लिए लोगों को अपने घरों से काफी दूर तक जाना पड़ता है। यहाँ के ऊबड़-खाबड़ रास्ते इसे और दुष्कर बना देते हैं। वैसे भी अधिकांश पहाड़ी नगरों में इन दिनों स्कूल-कालेज बन्द हो जाने से लोग बाहर चले जाते हैं। इनमें से शायद ही कोई मतदान के लिये लौटेगा। यदि ठंड का पाँच प्रतिशत भी मतदान पर असर पड़ा तो चुनाव परिणाम इससे अछूते नहीं रहेंगे।
सवाल राज्य के नेताओं की हैसियत को लेकर भी उठ रहा है। आयोग ने जब चुनाव की तिथि घोषित की तो मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने तिथि को अव्यावहारिक बताते हुए इसे बदलने की माँग की। खंडूरी की इस माँग का चुनाव आयोग पर कोई असर नहीं हुआ। वहीं राज्य के पाँचों कांग्रेसी सांसदों द्वारा इस निर्णय पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करने से लगा मानो सब कुछ उनके ही इशारे पर हो रहा हो। कुल मिलाकर दिल्ली में बैठे भाजपा कांग्रेस के आकाओं ने समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनाकर ये साबित तो किया ही है कि उनके सामने राज्य की कोई हैसियत नहीं है। वे जो चाहें और जब चाहें राज्य में कर सकते हैं। ठीक वैसा ही व्यवहार भारत के निर्वाचन आयोग ने उत्तराखंड के साथ किया है।