सेवाग्राम में आयोजित तीसरे राष्ट्रीय नदी सम्मेलन के उद्घाटन में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान मुकुन्द घारे ने कहा कि हालाँकि बापू की पुण्यस्थली यह कहने के लिये उचित जगह नहीं है, लेकिन यह सच है कि आज यदि मेरी आयु पच्चीस वर्ष की होती तो मैं नक्सलवादी होता। देश की लगभग तीन दर्जन नदियों के जल के कुम्भ को स्पर्श कर सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद ‘बापू कुटी’ के बरामदे में चर्खा कातते, जीवित गांधीवादियों में सबसे वरिष्ठ, 94 वर्षीय ठाकुरदास जी बंग को मैंने जब मुकुन्द घारे के वक्तव्य के बारे में बताया तो उन्होंने कहा, शायद मैं भी वही होता! ….. सेज, मॉल और नेशनल एक्सप्रेस हाईवे में भारत की खुशहाली तलाश रहे योजनाकारों की करनी पर यह कैसी कठोर टिप्पणी है ?
हम लोग इस गलतफहमी में थे कि सिर्फ उत्तराखंड सरकार ही ‘ऊर्जा प्रदेश’ बनने की हड़बड़ी में अपनी जनता पर जोर जबर्दस्ती कर रही होगी। राज्य की नदियों पर तुगलकी अंदाज में जोर-जबर्दस्ती के साथ बनायी जा रही लगभग 200 लघु जल विद्युत परियोजनाओं से ऐसा ही लगता था। लेकिन सेवाग्राम में मौजूद 12 राज्यों के प्रतिनिधियों के अनुभव सुन कर लगा कि योजनाकार और सत्ताधीश सर्वत्र ऐसी ही जिद पाले हुए हैं। कहीं खनिजों के बेशकीमती भंडार के दोहन के लिये औद्योगिक घरानों और बड़ी कम्पनियों को लाया जा रहा है तो कहीं बिजली उत्पादन बढ़ाने के नाम पर स्थानीय ग्रामीणों को उनके पारम्परिक जलस्रोतों से बेदखल किया जा रहा है। ऐसी लालची विकास नीतियों से कहीं नदियों की भूग्रहण क्षमता कम हो गई है तो कहीं सूखा और अकाल के प्रकोप बढ़ गये हैं।
उड़ीसा में हीराकुड बाँध के लिये 57 गाँवों के जिन 22,144 परिवारों को सन् 1955 में हटाया गया था, उनमें से 3,540 परिवार आज भी विस्थापित नहीं हो पाये हैं और भिखारियों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बिहार में बागमती, कमला, बलान, महानन्दा, कोसी, गंडक आदि सभी नदियाँ बुरी हालत में हैं। पिछले साल जबर्दस्त अतिवृष्टि हुई। चाँदन नदी ने तीन बार आयी बाढ़ से 150 एकड़ जमीन को बालूमय कर सम्पन्न किसानों को खेत मजदूर बना दिया। इस गति से चाँदन के दोनों किनारे कुछ ही वर्षों में रेगिसतान बन जायेंगे। गंडक नदी के चम्पारण तटबंध ने चन्द्रावत के उद्गम और संगम को बाँध दिया है। इससे पूरी घाटी में जल भराव होने लगा है। सिकहरना नदी मर रही है।
कर्नाटक में शरावथी नदी को बचाने के लिये स्थानीय लोग जुटे हुए हैं। सुप्रसिद्ध जोग फॉल का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। तमिलनाडु में कोयम्बटूर के औद्योगिक आस्थानों के प्रदूषण से नौयल दम तोड़ रही है। पचारू नदी जलागम क्षेत्र में जंगलों के अनियंत्रित कटान तथा रेता खदान से सूख रही है। केरल में सबरीमाला तीर्थ से लगी, दक्षिण की गंगा कही जाने वाली पम्पा का भविष्य भी अवैध खनन और जंगल कटान से खतरे में है। चालाकुडी नदी पर बन रही 163 मेगावाट की अथिरापिल्ली जल विद्युत परियोजना के विरोध में स्थानीय लोग डट कर आन्दोलन कर रहे हैं। गोआ में दूधसागर (खांडेपार) नदी के किनारे बरसात समाप्त होने के बाद होने वाली धान की खेती अब नहीं होती।
देश भर का यह परिदृश्य देख कर भागीरथी, अलकनन्दा और मंदाकिनी में जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध करने वाले ग्रामीणों के व्यवहार में हमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगा। न ही बागेश्वर जनपद में सरयू पर बन रही परियोजना के खिलाफ 55 दिन से आमरण अनशन कर रहे आन्दोलनकारियों का कदम हमें अतिवादी लगा। जल, जंगल और जमीन जैसी नैसर्गिक चीजों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार को नकारा जायेगा तो असंतोष तो उठेगा ही और फिर वह कहीं तक भी जा सकता है। पानी के बिना क्या जीवन चलेगा ?
उत्तराखंड में एक दर्जन नदियों के किनारे दो सप्ताह तक पदयात्रायें करने और तत्पश्चात् रामनगर में एक दो दिवसीय नदी सम्मेलन करने से पूर्व हमने वर्ष 2008 को ‘उत्तराखंड नदी बचाओ वर्ष’ घोषित किया था। आखिर यह वर्ष और दिवस घोषित करने का ठेका संयुक्त राष्ट्रसंघ या भारत सरकार का ही क्यों हो ? जनता ऐसी घोषणा क्यों नहीं कर सकती ? हमारे इस प्रयास को सेवाग्राम में अत्यन्त सराहा गया और 18 फरवरी को जारी सेवाग्राम घोषणा में वर्ष 2008 को राष्ट्रीय स्तर पर नदी वर्ष घोषित कर इस पूरे वर्ष देश भर में जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। यह भी तय किया गया कि हर साल 20 मार्च को सम्पूर्ण भारत में ‘जल अधिकार दिवस’ तथा 25 मई को ‘नदी दिवस’ के रूप में मनाया जायेगा। 20 मार्च 1927 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने महाड के कोलाबा में सार्वजनिक तालाब से पानी लेकर जल सत्याग्रह की शुरूआत की थी। 25 मई को नदियों में प्रदूषण का स्तर अपने चरम पर होता है।
सेवाग्राम घोषणा में यह भी कहा गया कि, नदियाँ पवित्र, जीवनदायिनी एवं मातृस्वरूपा हैं। नदियों को जीवित रहने का अधिकार है। नदियों के स्वाभाविक प्रवाह को बाँधना या रोकना अपराध है। नदियों को प्रदूषित करने का हक किसी भी व्यक्ति या संगठन को नहीं है। ऐसा करने वालों को दंडित किया जाना चाहिये। देश भर में नदियों को बचाने के लिये जहाँ-जहाँ भी संघर्ष चल रहे हैं, यह सम्मेलन उनका समर्थन करता है और सभी का आह्वान करता है कि ऐसे आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी करें। पानी का पहला उपयोग पीने और घरेलू उपयोग तथा तत्पश्चात् खाद्यान्न उपज हेतु सिंचाई के लिये होना चाहिये। शेष पानी का औद्योगिक एवं व्यावसायिक उपयोग स्थानीय समुदाय की सहमति से बगैर पर्यावरण को हानि पहुँचाये होनी चाहिये। जल, जंगल और जमीन पर पहला हक स्थानीय समुदाय का होना चाहिये। उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद निजीकरण के रूप में निजी कम्पनियों द्वारा बनाई विकास योजनाओं का यह सम्मेलन विरोध करता है। नदी जोड़ने की योजना सूखा और बाढ़ का समाधान नहीं है। हिमालय से समुद्र तक नदियों के जलागम क्षेत्र का समुदाय की भागीदारी से सम्यक् विकास ही इन समस्याओं का समाधान है।
18 फरवरी को संत विनोबा के पवनार आश्रम के सामने धाम नदी में तीन दर्जन नदियों के जल को एक सामूहिक संकल्प पढ़ने के साथ विसर्जित किया गया और तीसरा राष्ट्रीय नदी सम्मेलन समाप्त हुआ। लेकिन यह सवाल सबके मन में रह गया कि क्या नैसर्गिक संसाधनों पर अधिकार के लिये जनता को लगातार लड़ता ही रहना पड़ेगा ? हमारी लोकतांत्रिक सरकारें कब इतनी संवेदनशील होंगी कि समुदाय के अधिकार को खुले मन से स्वीकार कर सकेंगी।
























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