मुख्यधारा के अखबारों में प्रायः घटनायें एक सामान्य ब्यौरे के रूप में होती हैं। उनका विश्लेषण प्रायः नहीं होता। कुछ घटनाओं में उसे सचमुच चटखारे लेने का मौका मिल जाता है, जैसे देहरादून में कार्यरत इंजीनियर राजेश गुलाटी द्वारा अपनी पत्नी अनुपमा की हत्या कर उसके शव को डीप फ्रीजर में रखकर धीरे-धीरे शव के टुकड़े ठिकाने लगाने की लोमहर्षक घटना। लेकिन ज्यादातर वह तथ्यों को प्रस्तुत भर करके अपने हाथ झाड़ लेता है। लेकिन कुछ खबरें सचमुच विश्लेषण की अपेक्षा रखती हैं।
मसलन समूह ‘ग’ में भर्ती की परीक्षाओं में कुमाउनी, गढ़वाली और जौनसारी बोलियों की अनिवार्यता समाप्त करने का मामला। बताया गया है कि कैबिनेट ने समूह ‘ग’ की भर्ती का जिम्मा लोक सेवा आयोग से हटा कर प्राविधिक शिक्षा परिषद को देने के साथ ही भर्ती परीक्षा में उत्तराखंड की कला, संस्कृति, भाषा तथा इसी तरह के सामान्य ज्ञान की जानकारियों को अनिवार्य बनाया था। लेकिन फिर पर्यटन मंत्री मदन कौशिक के विरोध के कारण कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी बोलियों की अनिवार्यता को खत्म कर दिया।
मदन कौशिक को लगा होगा कि इन बोलियों की जानकारी की अनिवार्यता से मैदानी मूल के अनेक लोगों के लिये यह परीक्षा कठिन हो जायेगी। चूँकि उनका वोट बैंक ऐसे लोगों पर आधारित है, अतः उन्होंने अपना चरित्र दिखलाया। वोट की राजनीति में यही होता है। उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान भी बहुत सारे ऐसे लोग ‘उधमसिंह नगर रक्षा समिति’ के बैनर के नीचे खड़े होकर उधमसिंह नगर को उत्तराखंड से बचाने के लिये जी जान की बाजी लगा रहे थे। उस वक्त उनकी नहीं चली तो उन्होंने हरिद्वार को भी उत्तराखंड में मिला कर इस विशिष्ट भौगोलिक इकाई की जन सांख्यिकी को गड़बड़ा दिया और अब तो विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद उत्तराखंड विधानसभा में जनसंख्या की दृष्टि से विरल पहाड़ की सीटें कम हो रही हैं और जनाकीर्ण मैदान की सीटें बढ़ने वाली हैं। प्रदेश की राजनीति में इनका दबदबा बढ़ गया है।
लेकिन बात इतनी सामान्य नहीं है। उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन के दौरान ही ‘भनमजुवा’ समझे जाने वाले उत्तराखंडी को एक पहचान मिली थी। राज्य गठन के बाद भी उसे और कुछ मिला हो या न मिला हो, यह पहचान अवश्य मजबूत हुई है। हमारी जन विरोधी और असफल सरकारों ने भी बताया है कि 53,483 वर्ग किमी में फैले चौरासी लाख नवासी हजार तीन सौ उनचास जनसंख्या वाले इस प्रदेश का राज्य पुष्प ब्रह्म कमल है और राज्य वन्य पशु कस्तूरी मृग है। राज्य वृक्ष बुराँश है और राज्य पक्षी मोनाल है। यहाँ झुमैलो, थड्या, चौंफला, चाँचरी, छपेली, छोलिया आदि लोकगीत-लोक नृत्य होते हैं। बोली-भाषा के साथ मिल कर ये तमाम चीजें उत्तराखंड का व्यक्तित्व बनाती हैं। इनके साथ छेड़छाड़ करने का अर्थ है राज्य का बेमानी हो जाना। हालाँकि अब बहुत से लोग कह रहे हैं कि वह पहले ही बेमानी हो चुका है।
यह आशंका निराधार है कि इन भाषा-बोलियों को प्रश्रय देने से मैदानी मूल के लोगों पर खतरा आ जायेगा। आखिर बंगाल की भाषा बंगाली ही होगी और तमिलनाडु की तमिल। अन्य भाषा-भाषियों के जो बच्चे वहाँ पढ़ रहे होंगे, जरूरत पड़ने पर इन भाषाओं को सीखेंगे ही। जहाँ तक उत्तराखंड का सवाल है, यहाँ ही कितने बच्चे इन भाषाओं के जानकार होंगे ? पढ़-लिख कर इन भाषाओं से कतराने की यहाँ पुरानी परम्परा है। गढ़वाली तो सार्वजनिक रूप से कहीं-कहीं सुनाई भी दे जाती है। मगर कुमाउनी के तो बुरे हाल हैं। हिन्दी खड़ी बोली को पढ़े-लिखे होने का प्रमाण माना जाता है और ज्यादा सुसंस्कृत होने के लिये अंग्रेजी को। ऐसे में जितनी कुमाउनी-गढ़वाली कुमाउनी-गढ़वाली मूल के युवक जानते होंगे उतनी तो मैदानी मूल के युवक भी दो-चार दिन में सीख ही जायेंगे।
मूल सवाल उत्तराखंड की पहचान मिटाने का है। यह षड़यंत्र राज्य बनने से पहले से ही रचा जा रहा था। राज्य बनने के बाद इसे अलग-अलग तरीकों से मजबूत किया जा रहा है। वोट के इस चक्कर में उत्तराखंड की अस्मिता बुरी तरह पिस रही है। कभी-कभी भय भी लगता है कि इस तरह के कारनामे कहीं 1994 जैसे जन विस्फोट को जन्म न दें।
ऐसे में मलहम लगाने वाली एक खबर कानपुर से आयी है। 2 अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा में उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर पुलिस ने उत्तराखंड राज्य आन्दोलनकारियों पर जो जुल्म ढाये, उससे व्यथित होकर एसपी ट्रैफिक कानपुर के गोपनीय कार्यालय में तैनात आरक्षी रमेश दुबे ने इस बर्बरता को असंवैधानिक मानते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन उनके एस.एस.पी. ने इस इस्तीफे को न मानते हुए उनके कृत्य को अनुशासनहीनता माना और उन्हें मुअत्तिल कर दिया। दुबे तब से कानूनी लड़ाई लड़ते रहे। मुजफ्फरनगर कांड के कुछ गवाह मर गये, ज्यादातर आरोपी इस या उस कारण से छूटते रहे। अनन्त कुमार सिंह जैसे इस कांड के मुख्य आरोपी भाजपा, कांग्रेस और सपा, बसपा सरकारों में तरक्की पाते रहे। अनन्त कुमार सिंह को उत्तराखंड की अपनी हाईकोर्ट ने ही 2003 में दोषमुक्त किया और फिर जनरोष को देखते हुए तत्काल अपना फैसला बदल भी दिया। पुलिस में ही इस कांड के मुख्य आरोपी बुआसिंह अब सेवानिवृत्त होकर उत्तराखंड में ही, मसूरी में एक होटल के मालिक बन बैठे हैं। मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को दंडित किये बगैर उत्तराखंड राज्य के गठन को निरर्थक मानने वाले सारे आन्दोलनकारी भी अपनी-अपनी जगह फिट होकर गदगद हैं। ऐसे में पुलिस का एक सामान्य सिपाही उस मुद्दे के लिये बगैर तनख्वाह के कैसे सोलह साल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा होगा, जो मूलतः उत्तराखंड का मुद्दा था ?
लेकिन अत्यन्त चमत्कारिक रूप से 2 दिसंबर 2010 को एक फैसले में हाईकोर्ट ने रमेश दुबे के तर्क को स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी के दौरान 25 प्रतिशत वेतन तथा वरीयता तथा पेंशन के सभी लाभ देने का निर्णय किया है। ऐसे में बरबस यह कहने की इच्छा होती है- सत्यमेव जयते !
बधाई रमेश दुबे !