विवेक डसीला
उत्तराखंड में अब कुछ जिलों का प्रशासन भी बिकने के लिए तैयार है। बस आपकी गाँठ में रोकड़ा होना चाहिए।मंत्री-नेता की सिफारिश से रियायत की कोई गारंटी नही। दरअसल इस छोटे से राज्य को अब तक के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और नेताओं से प्रेरणा लेकर ही तो प्रशासन ने यह रास्ता अख्तियार किया है। एक बानगी देखिए…..
बागेश्वर पिछड़ा व छोटा सा जिला है। कोई बड़ा नौकरशाह तो छोडि़ये, आम सरकारी कर्मचारी भी ट्रांस्फर पर यहाँ आने को कालापानी की सजा समझता है। अब ये दीगर बात है कि इन दिनों वापस लौटने वक्त उसे और ज्यादा तकलीफ होने लगी है। बेशर्म और बेपनाह कमाई उनके कदम रोक लेती है।
गत वर्ष पुलिस ने पाँच तस्करों को बाघ की खालों, भालू की पित्ती व कस्तूरी के साथ पकड़ा। रात भर सौदा एक और दो में लाख अटका रहा। सुबह महकमे के बड़े साहब को जब पता चला कि पकड़े गए युवकों में से एक मोटे पैसे वाला है तो भाव ऊँचे कर दिए गये। देर शाम तक सौदा निपट सका। बाद में दो तस्करों को मात्र बाघों की खालों के साथ दिखा दिया। छोटी जगह….. बात फैल गई। लोग गरियाते रह गए। फिर नगर से सटे मालता गाँव के एक दुकानदार के पास पुलिस ने पचास पेटी चंडीगढ़ मार्का शराब पकड़ी। साहब ने बुलाया…फटकारा और महीना तय कर दिया। तब से उसे थाने का मुँह देखने की जरूरत नहीं हुई। शराब तस्करों व लाइसेंसी शराब की दुकानों का महीना तय करने के बाद साहब ने नीचे वालों को इशारा कर दिया है। ग्रामीण इलाके में शराब मिलनी आसान हो गई। चरस के तस्करों को सीमा पार करने में अब कठिनाई नहीं होती। पुलिस के कागजों से इस तरह के अपराध गायब हो गए हैं। ज्यादातर अखबारों के पन्नों से भी….. क्योंकि पत्रकारों को दारू-मुर्गा उपलब्ध है।
अब बागेश्वर उस तरह पिछड़ा भी नहीं रहा। यहाँ मैखाना (बार) खुल गया है। न संस्कृति के किसी ठेकेदार की तरफ से इसका विरोध हुआ, न धार्मिक आस्था पर चोट पहुँची। इसके बावजूद नगर के खासोआम का दिमागी दिवालियापन दूर नहीं हुआ। वह बदस्तूर होटलों को गुलजार करता रहा। बार में सुनसानी बनी रही। जनता का सर्वेक्षण कहता है कि बार मालिक ने अपनी गाड़ी जिला प्रशासन के छोटे नवाब की सेवा में सुपुर्द करने के साथ ही एक गठरी उनके चरणों में रख दी….. हुजूर बहुत इन्वैस्टमेंट किया है! गदगद होकर साहब ने तमिल पिक्चरों के हीरो का जैसा रूप दिखाया तो अगली रोज ही नगर में भूचाल आ गया। देर रात तक यहाँ छापा…वहाँ छापा। शराबी मिलने मुश्किल हो गये तो माँ-बहिन की गालियों से नवाजते हुए होटल मालिकों को ही जीप में ठूँस-ठूँस कर थाने में पटक दिया। जनता का सर्वेक्षण कहता है कि अब बार चहकने लगा है।
खंडूरी का सुशासन आने पर प्रोन्नत होकर एक नौकरशाह ने बागेश्वर की कमान सम्हाली। ‘खंडूरी के शेर’ ने आते ही जो दहाड़ लगाई तो जनता को रामराज्य के सपने आने लगे। सूखे नलों से पानी टपकने लगा….. सड़कों के गड्ढे गायब होने लगे……। गरुड़ तहसील के एसडीएम को बागेश्वर ला पटका तो कलैक्ट्रेट के घाघ बाबुओं की नजरें सीधी व जुबान मीठी हो गई। वक्त पर काम पूरा न होने पर काली सूची में डालने की धमकी मिलने पर कोश्यारी गुट के ठेकेदार भी सकते में आ गये….‘जनरल’ ने ये कैसा बदला लिया ? जनता बेसाख्ता वाह-वाह कहते हुए खंडूरी को असीसने लगी।
लेकिन यह मीठा सपना थोड़े ही समय रहा। बाबुओं ने फुसफुसाया, ‘‘कलेक्टर साहब को अनुभव जरा कम है….. खरीद-फरोख्त का। उनकी मदद के लिए एक पीए तो चाहिए…..हल्द्वानी से ही दोनों की अच्छी जोड़ी बनी….प्लाटों के खरीद-फरोख्त में।’’ इधर नल फिर से सूख गए हैं….सड़कों का काम थम सा गया है…. बाबुओं की नजरें टेढ़ी हो गई हैं। आचार संहिता की आड़ में नेताओं को जो औकात दिखाई, उससे जाना तो तय है ……इसलिये उगाही तेज हो रही है।
ग्यारहवीं की गृह परीक्षा के पेपर इस बार भी विद्यार्थियों के हाथों में पहले ही आ गए। 14 फरवरी की शाम कुछ छात्रों द्वारा आपस में बाँटने से पेपर लीक होने का यह मामला चर्चा में आ गया। गत वर्ष पेपर लीक होने का मामला फटाफट दबा दिया गया था। जनता का सर्वेक्षण है कि ये हर साल का धंधा है। वर्कर अद्धे-पव्वे में खुश हो जाते हैं। उत्तराखंड का तो सलेबस ही एक हो गया है। यहाँ के छापाखाने वालों को अकसर अन्य जिलों से भी पेपर की डिमांड आ जाती है तो वे ज्यादा ही छाप कर रखते हैं। इस घोटाले की खबर स्थानीय अभिसूचना इकाई ने हाकिमान को दी। दिन भर के थके-माँदे हाकिमों को अपने जाम छोड़ कर आपात्कालीन बैठक करनी पड़ी। छापाखाने पर छापा पड़ा तो मालिक ने पेपर लीक होने की बात पर हैरत जताई और अपनी ईमानदारी का सबूत देने के लिए वो छपाई में खराब हो गये कुछ पेपर छापामार टीम को सौंप दिये। देर रात जिला शिक्षाधिकारी (बेसिक) द्वारा लिखाई एफ.आइ.आर., जिसे वे अब दबाव में लिखी बताते हैं, में एल.आइ.यू. के हवाले से छापाखाने के साथ तहसील रोड के एक साइबर कैफे को दोषी बताया गया। अंग्रेजी न जानने वाले साहब की जीप के ड्राइवर ने गफलत में रात के अंधेरे में ‘अंधेर नगरी’ की तर्ज पर साइबर कैफे वाले को बलि का बकरा बना दिया। सुबह साइबर कैफे को सीज कर वहाँ से एक नई हार्ड डिस्क व खराब प्रिन्टर पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया। इधर एलआइयू विभाग भी खुद सकते में था कि उसे क्यों लपेट दिया गया और उधर व्यापारियों का एक दल विरोध जाहिर करने डी.एम. से मिला तो डीएम साहब बिफर गये कि अभी धारा 144 लगी है…..वे जो चाहेंगे वो ही होगा। बहरहाल शाम तक साइबर कैफे को मुक्त कर दिया गया।
यह मामला संवेदनशील था। प्रशासन ने अपना स्तर कतई नहीं गिरने दिया। दस लाख के करीब पुलिस महकमे तथा पाँच लाख के करीब नौकरशाही के हाथ लगे। शिक्षा विभाग ने पिछली तारीख में कुछ पेपरों की माँग का एक ऑर्डर बना कर छापाखाने को दे दिया है, ताकि इतनी सेवा के बाद उसका सुरक्षित रहना सुनिश्चित हो जाये।…..जल्दी ही फाइनल रिपोर्ट भी लग जायेगी।
जनता का सर्वेक्षण है कि असंतोष फैलाने वालों से ध्यान बँटाने के लिए ही खडि़या खानों में छापामारी खडि़या के कट्टे सील करने की कार्यवाही शुरू की गई। मगर…..ये ल्लो, उसे तो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी ही मिल गई। औरों की कौन कहे……प्रदेश के मंत्री बलवंत भौर्याल को तक रीमा की अपनी खडि़या खानों व खडि़या के बैगों की रखवाली के लिए भागना पड़ा। दो दिन तक चली छापामार कार्यवाही के बाद प्रशासन को खडि़या खनन में कोई अनियमितता नहीं मिली….पर्यावरण भी स्वस्थ मिला। प्रशासन ने फिलहाल करीब एक करोड़ की लागत का सामान सीज किया है और छुड़वाने के लिये रेट लिस्ट बना दी है।
जनता का सर्वेक्षण है कि यह भविष्य में आने वाली नौकरशाही के लिये एक पाइलट प्रोजेक्ट है। आने वाले दिनों में सर्वत्र बागेश्वर जैसा ही प्रशासन मिलेगा। आमीन….
आप सब को होली की बहुत-बहुत बधाइयाँ!
यह साहस नैनीताल समाचार और उसकी टीम ही कर सकती है।