कृषि व पशु पालन सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं को लेकर उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से आये किसान एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 25 अगस्त 2011 को नई टिहरी में विशाल प्रदर्शन कर एक सभा की। ‘बीज बचाओ आन्दोलन’ की अगुवाई में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि हमारी जीवन पद्धति व संस्कृति के साथ ही आजीविका का मूल आधार खेती व पशुपालन खतरे में हैं। हम हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन बदलती जलवायु और मौसम कब हमारी आशाओं में पानी फेर दे कुछ पता नहीं। फसल के साथ ही कभी जमीन भी नष्ट हो जाती है।
जंगली जानवरों द्वारा खेती को पहुँचाये जा रहे नुकसान पर वक्ताओं की चिन्ता थी कि दिन को बंदर व रात को सेही,सुअर आदि जानवर बीज बुवाई से लेकर कटाई तक उनकी फसलों को नष्ट कर उनके हाथ का ग्रास छीन लेते हैं। नागरिकों की जान-माल की रक्षा का दायित्व सरकार का है। पर बाड़ ही उजाड़ खा रही है। खेती के नुकसान को बचाने के बजाय वन विभाग शहरों से बंदरों को ट्रकों में भर कर गाँवों में छोड़ देते हैं। सुअरों के आतंक से पहाड़वासी त्रस्त हैं। सुअर दिन में भी आबादी की ओर रुख करने लगे हैं। बाघ मानव व पशुओं को अपना शिकार बना रहा है।
सरकार जैविक राज्य की बात करती है, पर उसका कृषि विभाग कोदा-झंगोरा के लिए रासायनिक खाद दान कर इसकी जैविक प्रकृति को खत्म करने पर जुटा है। उत्तराखंड की खेती हमेशा से जैविक व प्राकृतिक थी। लेकिन जबर्दस्ती रासायनिक खाद डलवाकर फसल के साथ ही खेतों की मिट्टी एवं यहाँ के पर्यावरण को क्षति पहुँचेगी। सरकार ने ‘गौवंश संरक्षण अधिनियम 2007’ तो बनाया है, लेकिन गौवंश को क्षति पहुँचाने के लिए वह गाय-भैंस की देशी नस्ल को खत्म करने के लिए 30 से 60 हजार रुपया अनुदान दे रही है, जबकि बैल व सांड पर एक पाई भी अनुदान नहीं है।
मिट्टी किसान का मूलधन है। इसे नष्ट करने के लिए सरकार एक तरफ रासायनिक खाद एवं जमीन के लिए जहर का प्रचलन बढ़ा रही है तो दूसरी ओर खेती योग्य जमीन को बडे़ बडे़ बाँधों एवं अन्य विनाशकारी योज्नाओं के माध्यम से नष्ट किया जा रहा है। जल-जंगल-जमीन एवं खेती-पशुपालन लोगों की आजीविका के मूल संसाधन हैं जिन पर लोगों का मौलिक अधिकार है। सभा के अन्त में मुख्यमंत्री को सम्बोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंप मांग की गई कि-
1. राष्ट्रीय एवं राज्य कृषि नीति पर किसानों के सुझाव लिए जायें। कृषि नीति किसानों के हित में होनी चाहिए, कम्पनियों के हित में नहीं। हाल ही में घोषित उत्तराखंड की कृषि नीति आधी-अधूरी है। बीज बचाओ आन्दोलन ने पूर्व में भी कृषिनीति पर एक मसौदा सरकार को सौपा था, उसके कुछ अंशों को ही इसमें शामिल किया गया है। जनहित में इस पर व्यापक कार्यवाही की जाय। इस पर अनुदान बढ़ाया जाय और रासायनिक उपकरणों पर अनुदान घटाया जाय।
2. नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा हो। जन-दबाव में मुख्य जन्तु प्रतिपालक उत्तराखंड द्वारा सुअरों को मारने का आदेश जारी किया था, पर आज तक वन विभाग काश्तकारों को नुकसान पहुँचा रहे एक भी सुअर को नहीं मार पाया। अतः इस आदेश का कड़ाई से पालन हो। बंदरों की बढ़ती जनसंख्या को गम्भीरता से लेते हुए एक दीर्घगामी कार्ययोजना बनाई जाय। हिमाचल सरकार की तर्ज पर बंदरों की नसबंदी करवाई जाय। टी.एच.डी.सी. जंगली जानवरों की बढ़ी संख्या के लिए जिम्मेदार है, जिसने लोगों का विस्थापन तो किया किंतु जंगली जानवरों को खेतों की ओर खदेड़ दिया। जानवरों द्वारा फसल के प्रतिकर का अधिकार किसानों का है। विगत वर्ष टिहरी के सकलाना रेजं द्वारा कई गांवों में सर्वे कर नुकसान का जायजा लिया गया, लेकिन प्रतिकर नहीं मिला। इसकी जाँच हो।
3. केन्द्र सरकार की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अन्तर्गत तदन्य मोटा अनाज पोषण सुरक्षा पहल कार्यक्रम के लिए कोदा-झंगोरा की फसलों को बचाने के लिए राज्य सरकार को पाँच करोड़ सतासी लाख रुपए मिले है। इस धनराशि का सदुपयोग किसानों के हित में किया जाय। जैविक खाद एवं पारंपरिक बीज को बढ़ावा दिया जाय। इससे उपज भी बढ़ेगी और मिट्टी और पर्यावरण की हिफाजत भी होगी। केन्द्र एवं राज्य सरकारों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दलाली बन्द कर उनके बीज, खाद एवं अन्य उपकरण खरीदने पर रोक लगानी चाहिए।
4. सूखा, बाढ़, एवं भूस्खलन से क्षतिग्रस्त फसलों एवं जमीन पर आज के बाजार भाव के अनुसार प्रतिकर दिया जाना चाहिए, पुराने रेटों में तुरन्त संशोधन हो।
5. मिट्टी संरक्षण को प्राथमिकता दी जाय। सीढ़ीदार खेतों से उपजाऊ मिट्टी बह-बहकर जा रही है। खेती योग्य उपजाऊ जमीन का दुरुपयोग बड़े बाँधो, प्रदूषणकारी उद्योगों एवं गैर जरूरी सड़कों आदि के लिए नहीं किया जाये।
6. नई कृषि नीति में सारा कार्यक्रम स्वयं खेती करने वाले स्थानीय किसानों द्वारा चलाया जाना चाहिए। इसमें मैदानी जिलों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
7. पर्वतीय महिलायें खेती का 90 प्रतिशत से अधिक कार्य करती हैं। उन्हें अविलम्ब किसान का दर्जा दिया जाय।
8. महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में भूमि एवं फसल सुरक्षा चौकीदारी एवं घेर-बाड़ चारदीवारी के विभिन्न तौर-तरीकों पर काम करने की स्वीकृति दी जाय।
9. पशुपालन विकास के लिए एक टिकाऊ कार्य योजना बनाई जाय। गोधन को प्राथमिकता देते हुए गाय-भैंस के नैसर्गिक गर्भाधान केन्द्र गाँव-गाँव में होने चाहिए। कृत्रिम (इंजेक्शन) अप्राकृतिक विधि पर रोक लगाई जाय। हल लगाने के लिए बैल व गर्भाधान सांड व भैंसा सांड (बेला) पर विशेष सब्सिडी दी जाय। रासायनिक खाद व पावर टीलर/वीडर को हतोत्साहित किया जाय।