कोई अन्य कहता तो विश्वास नहीं होता, लेकिन यह घटना तो अपने ही साथ घटी थी।
खंडूरी जी के साथ यह तीसरी मुलाकात थी। पहली दो मुलाकातें उनके पिछले कार्यकाल में हुई थीं। पहली बार दिल्ली के उत्तराखंड निवास में उनसे मिला था। ‘नदी बचाओ अभियान’ की पदयात्रा खत्म होने के बाद जनवरी 2008 में रामनगर में एक सम्मेलन हुआ था और उसकी संस्तुतियों को लेकर हम मार्च अन्त में मुख्यमंत्री से बातचीत करने गये थे। आसपास कोई तड़क-भड़क नहीं थी, लेकिन उनका व्यवहार अत्यन्त रूखा था, बावजूद इसके कि राधा बहन जैसी अत्यन्त सम्मानित महिला हमारे साथ थीं। क्या हमें बिजली नहीं चाहिये, उन्होंने मिसाइल जैसा सवाल दागा। ‘‘मैं लालटेन की रोशनी में पढ़ा हूँ, आप लोगों को तो बिजली नसीब हुई होगी,’’ उन्होंने शिकायती भाव से हम सबमें सबसे कम उम्र लग रहे सुरेश भाई से पूछा। ‘‘नहीं, मैं छिलुके की रोशनी में पढ़ा हूँ,’’ सुरेश भाई ने जवाब दिया। लेकिन इसका कोई असर खंडूरी जी पर नहीं पड़ा। उनका सर्वथा नकारात्मक रुख देख कर मैं चुपचाप एक कुर्सी पर सिमटा हुआ बैठा रहा। बातचीत का कोई अर्थ ही नहीं था। फिर एक बार मैं देहरादून (या शायद सारे उत्तराखंड) के सबसे वरिष्ठ पत्रकार राधाकृष्ण कुकरेती और ‘युगवाणी’ के सम्पादक संजय कोठियाल के साथ उनसे सचिवालय में मिला। छोटे समाचार पत्रों की समस्याओं पर कुछ बातचीत करनी थी। ‘‘छोटा समाचार पत्र क्या होता है ?’’ छूटते ही उन्होंने इतने आक्रामक ढंग से पूछा कि मन उखड़ गया। ‘‘संजय, मुख्यमंत्री जी को छोटे समाचार पत्र की परिभाषा समझाओ,’’ मैंने संजय कोठियाल को बागडोर सौंप दी और फिर आगे की बातचीत में कोई हिस्सा नहीं लिया।
इस बार उनके दूसरे मुख्यमंत्रित्व काल की यह पहली मुलाकात थी। एक निजी काम से पिछले आठ-दस महीनों से सचिवालय में धक्के खा रहा हूँ। नैनीताल में कम, देहरादून में ज्यादा समय बीत रहा है। पिछले मुख्यमंत्री निशंक की सहानुभूति भी थी और वे इस मामले में चिन्ताग्रस्त भी दिखाई देते थे। हालाँकि उससे क्या होता है ? प्रदेश में सरकार या नौकरशाही नाम की कोई एतबार करने लायक चीज होती तो काम भी होता। बहरहाल, इतनी चप्पल घिसने के बाद मामला कुछ ढर्रे पर आता दिखाई दे रहा था कि सत्तापलट हो गया। हम औंधे मुँह जमीन पर ! बैक टु स्क्वायर वन। अब नये सत्ताधीशों के साथ पटरी बिठलानी थी। अलग से भेंट हो पाने की कोई सम्भावना न होने पर मैं पहुँचा खंडूरी के जनता दरबार में। उनके पी.आर.ओ. ने परिचय दिया, ये फलाँ-फलाँ हैं करके। गजब! खंडूरी जी खुल कर मुस्कराये। हाँ, मानिये तो सचमुच खंडूरी जी मुस्कराये! बोले, यह पत्र पढ़ने में तो थोड़ा वक्त लगेगा। यहाँ भीड़ देख रहे हैं ? मैंने कहा, कोई बात नहीं आप आराम से पढ़ लें, कुछ दिनों बाद फिर आकर मिल लूँगा और चला आया।
तो इस अनुभव से माना जा सकता है कि खंडूरी इस बार बदले हुए हैं। इसका असर भी पड़ रहा है। खास कर शहरी मध्य वर्ग उनकी अन्नागिरी से प्रभावित हैं। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है ? यह वर्ग भ्रष्टाचार की बात जितनी करे, वोट देने के लिये लाईन में लगने में तो अपनी तौहीन समझता है। भ्रष्ट अभी कोई सामने आता भी नहीं दिखाई दे रहा। केन्द्र की राजनीति में भ्रष्टाचार का हो-हल्ला हुआ तो कुछ दिग्गज जेल जाते भी दिखाई दिये। यहाँ तो मंत्रियों- नौकरशाहों के चेहरे भी नहीं बदले हैं। पिछली बार खंडूरी ने ठेका-दलाली खाने वाले पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं के पर कतर दिये थे। उनकी गद्दी इन्हीं लोगों ने छीनी, उनके रूखे व्यवहार या किसी विपक्षी दल ने नहीं। इस बार वे अपने व्यवहार में बदले हैं तो यह इलहाम भी उन्हें हो ही चुका होगा कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिये खेलने-खाने के मौके उपलब्ध करवाने होंगे। अभी ही संदिग्ध चरित्र के लोग उनके आसपास जुटने लगे हैं। फिर भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलने की गुंजाइश कहाँ बचती है ?
चरम सत्य तो वही है जो हम लगातार कहते रहते हैं। एक, भाजपा-कांग्रेस जैसे उन राष्ट्रीय दलों से उत्तराखंड का कल्याण नहीं हो सकता, जिनके मुख्यमंत्री को अपनी गद्दी बचाये रखने के लिये अपने केन्द्रीय नेताओं को नजराना देना पड़ता हो। दूसरा, सत्ता की राजनीति जब तक इसी तरह केन्द्रीकृत रहेगी और किसी भी सुयोग्य व्यक्ति के लिये चुनाव जीतना तब तक असंभव होगा, जब तक उसके हाथ में इन राजनीतिक दलों का टिकट और चुनाव लड़ने के लिये करोड़ों की माया न हो- तब तक किसी भी तरह के बदलाव की बात करना बेवकूफी है। इसलिये जनता तय करे कि उसे झटके से मरना है या हलाल से। कांग्रेस के हाथ लुटना है कि भाजपा के ?