केशव भट्ट
आईएमएफ के एक पर्वतारोही दल ने 6,322 मी. छांगुज चोटी सफलतापूर्वक फतह कर एक इतिहास रचा है। खतरनाक हिमदरारों व लगातार होने वाले एवलांचों की वजह से इस चोटी पर भारत के चार अभियान असफल हो चुके थे। 2007 में तो यहाँ एक शेरपा की एवलांच में दब जाने से मौत भी हुई।
छांगुज अभियान के लीडर ध्रुव जोशी ने बताया कि इस अभियान में शामिल आठ सदस्यों में से उनके नेतृत्व में लद्दाख के टकपा नोर्बू, शिलांग के वालम बाक, अल्मोड़ा के चेतन पांडे, शिमला के भारत भूषण की क्लाइम्बिंग टीम बनाई गई तथा पिथौरागढ़ के हरीश कुमार, मुनस्यारी के महेश धर्मशक्तू तथा गुजरात के डॉ. आनंद वैद्य की सपोर्टिंग टीम बनाई गई। 31 मई को एबीसी में पहुँचने के बाद से बर्फबारी शुरू हो गई, जिससे दस दिनों तक आगे की गतिविधियाँ रोकनी पड़ीं। बर्फबारी रुकने के बाद 11 जून को कैम्प एक तथा 15 जून को छोटा छांगुज में कैम्प स्थापित किया। 17 जून को रात्रि साढ़े बारह बजे चोटी फतह करने को चल पड़े। यहाँ से जीपीएस की मदद से 65 से 70 डिग्री के ढलानों में रोप फिक्स कर, कैरावासों को पार कर एवलांचों से बचते हुए सुबह साढ़े नौ बजे छागुंज की चोटी में जब कदम रखा तो सभी झूम उठे। करीब एक घंटे बाद बर्फीला तूफान शुरू होने पर सभी तेजी से नीचे को लौट पड़े। जोशी ने बताया कि भारत के पाँचवे प्रयास में छांगुज चोटी पर आईएमएफ के दल को जो सफलता मिली, वह काफी महत्वपूर्ण है। अत्यधिक हिमदरारों, एवलांचों के साथ ही इस चोटी का एप्रोच मार्ग काफी लंबा है। पिंडर घाटी की तरफ से छांगुज चोटी ही अविजित रह गई थी। छांगुज में 2007 में एक, 2009 में दो तथा 2010 में एक बार प्रयास किया गया। इस चोटी में विदेशी प्रयासों में से दो असफल हुए। 2009 में मार्टिन मोरेन का एक ब्रिटिश दल, मुनस्यारी से नंदा देवी इस्ट चोटी के अभियान में गया था। वहाँ सफलता न मिलने पर इन्होंने ल्वां ग्लेशियर की तरफ से छांगुज चोटी में प्रयास किया। बमुश्किल ये चोटी में पहुँच सके।
इसके साथ ही आईएमएफ के दूसरे 6,324 मी. नंदा भनार अभियान को अंतिम क्षणों में एक सदस्य के स्वास्थ्य खराब हो जाने के बाद रोकना पड़ा। इस अभियान के लीडर डॉ. अनिल गोर्टू ने बताया कि शिलांग के हॉकसन लिंगदोह, बुलंदशहर के भूपेश कुमार तथा नैनीताल से मो. उल्लास करीबी समेत चार पर्वतारोहियों ने कैरावासों व एवलांचों को पार कर अथक प्रयासों से कैम्प एक, दो व कफनी आइस फाल के नीचे नंदा भनार की चोटी को आरोहण करने के लिए 21 जून को समिट कैम्प लगा दिया। यहाँ से मात्र 250 मी की दूरी पर नंदा भनार की चोटी थी। एक सदस्य का स्वास्थ्य खराब होने के बाद इस अभियान को यहाँ से रैस्क्यू में बदलना पड़ा। वापसी में एवलांचों ने रास्ते के नामोनिशान ही मिटा दिए थे। दूसरे दल को रेडियो से सूचना देने पर वो भी मदद के लिए एबीसी में पहुँच गए थे। नंदा भनार के समिट कैम्प तक अभी तक कोई भी दल नहीं पहुँचा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में नंदा भनार चोटी को फतह करने का प्रयास किया जाएगा। डा. अनिल गोर्टू व धुव्र जोशी का कहना है कि इन अभियानों में हैप, लैप व गाईड की मदद के बगैर ही हमारी टीम को जो सफलता मिली वह सराहनीय है। दल की इस अभूतपूर्व सफलता पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के दिगम्बर सिंह, जगमोहन रावत, दशरथ सिंह, रतन सिंह तथा हिमालियन माउंटेनियर्स संस्था के भुवन चौबे, आलोक साह, पंकज पांडे, योगेश परिहार, संजय परिहार आदि ने दल को बधाइयाँ दी हैं।