लीजिए साहब, बारातों का यह सीजन भी निपट गया हर बार की तरह. ….हर बार शादियों के सीजन में शहर से कुछ परिचित चेहरे वाली अपरिचित लड़कियाँ अचानक गायब हो जाती हैं। कई दिनों तक आँखें उन्हें भीड़ में तलाशती रहती हैं। कई बार खयाल आता है कि गई होंगी कहीं रिश्तेदारी वगैरा में, आ जाएँगी। फिर एक दिन कोई आकर बताता है कि यार उनका तो बैंड बज गया, वे सात चक्कर गोल-गोल घूमीं और शहर वीरान कर गईं। तुम उन्हें यहाँ तलाश रहे हो और वो ससुराल में बैठी मुँह दिखाई वसूल रही हैं।
अच्छा! खैर चलो…… हर बार यही होता है…… जितनी लड़कियाँ शहर से विदा होती हैं लगभग उतनी ही नई-नई दुल्हनें शहर में धावा सा बोल देती हैं। कैट वॉक शैली में टहलती हुईं, अतिरिक्त जतन से बाँधी गई साँड भड़काऊ साड़ी, जेवरात की नुमाइश, कोहनियों तक चूड़ियाँ और किसप्रूफ लिपिस्टिक पोते जब वे चाट के ठेले पर गोलगप्पे नोश फरमाती हैं तो हथेलियों से कत्थक की कुछ अजब मुद्राएँ बनाती हैं- अनायास और सायास। मेकअप की पर्तों को भेदकर खुशी की एक शब्दातीत चमक उनके चेहरे पर रक्स कर रही होती है। जी करता है कि उनके आगे घुटनों के बल बैठकर कहा जाए- हमेशा यूँ ही चहकती रहना, खुश रहना…….
मगर अफसोस कि खुशियों की इस रक्कासा का स्टेमिना काफी कम होता है। यह ज्यादा देर नहीं नाच पाती, जल्दी ही हाँफ कर बैठ जाती है। पसीने से उसका श्रृंगार बह जाता है। ज्यादातर मामलों में ऐसा ही होता है। काश कि यह समय- मौसमे बहार इतना छोटा, ख्वाब सरीखा ना होता! काश ऐसा होता कि जो हनीमून पीरियड होता है वह जीवन भर के तमाम दुःख, अभाव, झूठ, अविश्वास, आह, रुदन, घुटन, शिकवे-गिले………….को भोगने का समय होता। बाकी जिंदगी का जो 99 प्रतिशत भाग बचता है उसमें हनीमून जितनी खुशियाँ और सुख होते, और कुछ न होता!
नई दुल्हनें कुछ दिन तक खुशी से कैसे फूल कर कुप्पा हुई रहती हैं। उनके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। जैसे उन्हें सुखों की लाइफ टाईम इनकमिंग का लिखित आश्वासन साक्षात ब्रह्मा आकर दे गए हों। यह वही लड़कियाँ होती हैं जो विदाई के वक्त यूँ रो-रोकर अधमरी हुई जाती हैं जैसे जिबह को ले जाई जा रही हों। लेकिन नहीं, इसमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं है जैसा कि कुछ लोगों को लगता है। यह दो अलग मनोदशाएँ हैं और स्वाभाविक हैं। बल्कि इसे प्रतीकात्मक रूप में देखा जाना चाहिए कि लड़की जीवन की इतनी महत्वपूर्ण शुरूआत रोने से करती है। और शादी के बाद जब दुल्हन अपनी सखियों के साथ शादी की वीडियो रिकार्डिंग देखती है तो सहेलियाँ खुद को रोती देख हँस-हँस के दोहरी हुई जाती हैं- देख तू कैसे रो रही है, मैं कैसे……….. यह भी एक प्रतीकात्मक सीन है- अपने को रोते देख हँसना!
बात भटक कर गंभीरता की ओर जाने लगी है, जबकि अपना ऐसा इरादा था ही नही। शादी बारात में भला क्या गंभीर होना। शादी में लड़की का बाप सीरियसली गंभीर होता है, दुल्हा-दुल्हन को गंभीरता ओढ़नी पड़ती है। बाकियों को शोभा नहीं देती। बारातों में भले-भले गंभीरों को उचक्कापन करते देखा जा सकता है। बारात और होली छिछोरपने के दो मुख्य भारतीय पर्व हैं, मत चूको चौहान।
ऐसे भी कुछ इलाके होते हैं कि अगर वहाँ से बारात बिना पिटे वापस आ जाए तो एकाएक विश्वास नही होता। ऐसे में कुछ अति उत्साही किस्म के लोग गिनीज बुक वालों को फोन करने की सोचने लगते हैं कि देखो हम बिना पिटे लौट आए, रिकॉर्ड हो गया! और कुछ ऐसे भी सूरमा टाइप बाराती होते हैं वे बारात में जाकर पी-पाकर उधम न करें, छेड़-छाड़ आदि क्रियाओं द्वारा पिटने-पिटाने का वातावरण निर्मित न करें तो लोग उनकी वल्दियत पर शक कर बैठते हैं। अरे यार फलाँ का लड़का तो बड़ी शराफत से बैठा है! उसी का लड़का है क्या?
राजेन्द्र यादव को शिकायत है कि इस्लाम का भारतीयकरण नही हो पाया। यादव साहब की बात जाने दीजिए, वो विद्वान हैं, बड़े आदमी हैं। लेकिन हाँ, इस बहाने मैं उत्तराखंड के मुसलमानों से एक अपील करता हूँ कि वे अपनी शादियों में सुवाल पथाई की तर्ज पर ‘कबाब पथाई’ की एक नई रस्म क्यों नही शुरू करते ? निकाह की रौनक में एक नया रंग! दीन और दुनिया दोनों सलामत। सोचिएगा किब्ला।
हर बार जब शादियों का सीजन शुरू होता है तो शादियों की भरमार देखकर यूँ लगता है जैसे अगले पाँचेक साल तक अब कोई शादी नही होगी। कौन बाकी रहा, सभी तो निपट गए। हर नत्थूखैरे की शादी हो जाती है। एक से एक डिफैक्टेड और आउटडेटेड पीस भी कुछ इस तरह निपट जाते हैं जैसे फटा नोट नोटों के बंडल में डालकर चला दिया जाता है। लगता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस गए होंगे। मुझ जैसे असामाजिक और घरघुस्सू आदमी के पास भी आधा दर्जन के लगभग निमंत्रण पत्र चले आते हैं।
बेचारे बैंड और टेंट वालों को इन दिनों मरने तक की फुर्सत नहीं होती। कैटरिंग वाला एक हाथ से पेशाब रोके है दूसरे से पूड़ियाँ छान रहा है। थकान और नींद पूरी न हो पाने के कारण बैंड वाले का जी तो चाह रहा है कि जहाँ जिस हाल में हूँ वहीं पड़ के सो जाऊँ। पर क्या करे मजबूरी है। जीना है तो बजाना पडे़गा। झक मारकर बजाए जा रहा है……….मेरी भी शादी हो जाए दुआ करो सब मिलके भाई……. इन लोगों की अपनी शादियाँ कब हो पाती होंगी भला! क्योंकि सीजन भर तो ये लोग दूसरों की शादियों में बैंड बजाते, पुलाव पकाते और तम्बू-कनात तानते रह जाते हैं। जिस तरह हाईब्रिड बीजों और पॉली हाउस के चलते किसी भी सब्जी का कोई सीजन नही रह गया है वैसे ही शादियों का कोई सीजन नही होना चाहिए। शादी क्या कोई आम है कि जिसका सीजन हुआ करता है कि पेट खराब होने की हद तक खालो, अभी सीजन है, फिर इच्छा होने पर भी नही मिलेगा। आम का तो तब भी अचार बन जाता है, शादी में ऐसी भी सुविधा नहीं कि सुखा लें, मुरब्बा बना लें। नहीं जी गलत बात है, अमेंडमेंट माँगता है।
बैंड बाजे में एक आदमी अपने को बड़ा ही निरीह और काबिले रहम नजर आता है। हर बारात में उसी को गौर से देखता हूँ। जी करता है कि बेचारे को अलग से ले जाकर कुछ खिला-पिला दूँ और सौ-पचास रुपया उसकी जेब में डाल दूँ। झुनझुने वाले की बात कर रहा हूँ। उस बेचारे की न तो कोई राह रोकता है, न कोई उससे अपने मनपसंद गाने की फरमाइश करता है, और रुपये भी उस पर कोई नही लुटाता। वह बस झुनझुना हिलाए जाता है। अकसर देखता हूँ कि वह मात्र शरीर से ही शादी में होता है, मन से कहीं और होता है। वह सिर्फ चंदन घिसता है, तिलक नहीं कर सकता। झुनझुना थमा देने वाले मुहावरे की शुरूआत यही से न हुई हो! वह शायद ट्रेनी होता है कि ले बेटा पकड़ झुनझुना, अपने कैरियर की शुरूआत यहाँ से कर। भारी और जिम्मेदारी वाले काम तुझे तेरी मेहनत और लगन को देखकर दिए जाएँगे। ![]()
जिन लड़को की नई-नई शादी हुई होती है वे अचानक संत हो जाते हैं। यूँ लगता है जैसे उनकी अभी तक की परवरिश किसी प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र या योग आश्रम में हुई हो। शराब, सिगरेट, गुटका वगैरा सब बंद। बस चाय। कुछ तो वास्तव में ऐसे होते भी हैं। लेकिन यहाँ उनका जिक्र नही हो रहा। वे मुख्यधारा से कटे हुए कुछ मुट्ठी भर अजूबे होते हैं। अजूबों को छोड़िये, सामान्य लोगों की बात करें। इन दिनों उनके पास दोस्तों के लिए समय नही होता। कभी मिल भी गए तो दुआ-सलाम के बाद हाथ छुड़ा लेंगे कि वो जरा वाइफ है न। नमस्कार के बाद जरा फासले पर खड़ी वाइफ जरा नहीं भरपूर होती है लेकिन वे बेचारे खुद इत्ते से भी नजर नहीं आते…… ज्यादा ही तलब लगने पर सिगरेट पी भी ली तो घर जाने से पहले माउथ फ्रेशनर चबाना नहीं भूलेंगे। लेकिन कुत्ते की दुम कितने दिन सीधी रह पाती है! सभी जानते हैं कि वह टेढ़ी ही होती है। किसी को कोई एतराज नहीं होता। एतराज तब होता है, बल्कि दिल बुरी तरह टूटता है जब दुम के सीधी होने का दावा/दिखावा किया जाता है। यह सरासर बेईमानी है, ठगी है। स्टेशन की दुकानदारी और मोहल्ले की दुकानदारी में जमीन आसमान का फर्क है। स्टेशन में ग्राहक जल्दबाजी में कुछ भी उल्टा-सीधा खरीद कर चला जाता है और शिकायत करने नही आता। जबकि मोहल्ले का ग्राहक जरा देर बाद फ्राइंग पैन में फूटा अंडा लिए आ धमकता है कि बच्चे को सड़ा अंडा दे दिया तुमने। ठगते हो……… तो शादी मोहल्ले की दुकानदारी की तरह है। अंडा अगर सड़ा है तो साफ कह दो, ग्राहक कटेगा नहीं।
अभी तक सीधी चल रही इस दुम में एक दिन जरा सा झुकाव आता है। लड़का एक दिन गुटका चबाता हुआ पाया जाता है तो कहता है कि वो जरा मुँह का स्वाद बड़ा अनप्लीजेंट-सा हो रखा था, पनवाड़ी ने पता नहीं क्या थमा दिया। सादा है, तंबाकू नहीं है इसमें। फिर कुछ दिन बाद वह एक दिन जिन, वोदका, बियर या कोई लेवर्ड दारू पीकर आता है कि दोस्तों ने शादी की पार्टी ले ली। जिद करने लगे तो इतनी सी साथ देने को मैंने भी चख ली। एक बार जो चखी तो फिर वह अकसर चखने लगता है। अजी कौन नहीं पीता आजकल, औरतें तक पीती हैं। हम उनमें नहीं जो नालियों में गिरे रहते हैं………. ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, कई और राज जिन्हें अफीम चटाकर सुला दिया गया था, उठ-उठ कर आँखें मलते हुए बाहर निकलते हैं-हैलो गुड मॉर्निंग! मसलन, मकान जिसे अपना बताया गया था वह किराए का है। ना-ना झूठ नहीं बोला था। असल में हुआ क्या था कि जिन दिनों शादी की बात चल रही थी उन दिनों मकान मालिक से इसे खरीदने की बात लगभग पक्की हो चुकी थी। फिर पता नहीं क्या हुआ कि मकान मालिक का मूड बदल गया। वैसे भी कहावत है कि बेवकूफ मकान बनाते हैं और बुद्धिमान उनमें रहते हैं……..
और आप खाँमखाँ लड़के को सीए समझ रहे हैं, वो तो कैशियर है, बड़े बाबू है। किसने कह दिया कि आपसे कि वो सीए है ? ना जी, मतलब ही नहीं होता, हम क्यों कहेंगे भला। आपके सुनने में मिस्टेक रही होगी। लोग उसे यूँ ही मजाक में सीए-सीए कह देते हैं। जैसे सिपाही को लोग दरोगा और कम्पाउंडर को डाक्टर नहीं कह देते लोग………. क्या होता है सीए होकर! सीए भी इंसान ही तो हुआ, उसके सिर पर कौन से सींग होते हैं! आदमी को दो रोटियाँ मिल जाएँ, घर में सुख-शांति रहे, आपस में प्यार होना चाहिए, और क्या करना है। छाती में रखकर कौन ले गया बहू आज तक, सब यहीं रह जाता है। चार दिन की जिंदगी है, रोकर क्या होता है, हँस कर गुजरे तो ही भला है। तेरे ग्रह-नक्षत्र ठीक हुए तो बल्लू एक दिन सीए भी हो जाएगा, सीए होने में क्या लगता है….. …. भगवान जो करता है भले के लिए ही करता है। और क्या, सही बात अम्माजी। सुन्दर, सुशील, सुघड़, गृह कार्य दक्ष,घरेलू टाइप की सीधी-साधी कन्या के बारे में दो शब्द अगर न कहे जाएँ तो सरासर अन्याय होगा। हालाँकि इस बारे में अपनी जीके बस ऐसी ही है। इसलिए ज्यादा उम्मीद न करें, संभलकर बैठने की जरूरत नहीं।
शादी के कुछ दिनों बाद लड़की कभी-कभी टीवी देखते समय चश्मा पहनने लगती है। ना-ना, आँखें एकदम सिक्स बाई सिक्स हैं। वो कभी-कभी सर में दर्द सा होने लगता है तो डॉक्टर ने कहा था लगाने को……… फिर उसके दाँतों की फिलिंग एक-एक कर उखड़ने लगती हैं। फुर्सत मिलते ही भद्दे तरीके से नाक कुरेदने की उसे आदत है। लड़की ने हिंदी में कुंजियाँ पड़-पड़ कर अंग्रेजी से एमए किया होता है। वह सूचना देती हैं कि एमए में मेरी फर्स्ट डिवीजन पक्की थी, सर मुझसे किसी बात पर चिढ़ गए इसलिए ”भाइभा“ में नम्बर कम मिले…. ….. वह शेक्सपियर को सैक्सपीयर कहती है। अपने पिता को याद करते हुए वह कहती है- पापा को ना बेफालतू की बातों पर भौती गुस्सा आता है…… एक बार भौत पहले मैंने पापा की बोतल में से इत्ती सी ब्रांडी चोर के चखने को ले ली थी। भौती कड़वी थी। मेरा तो यहाँ से यहाँ तक जल जैसा गया, उल्टियाँ आने को होने लगा, नींबू चाटा फिर। इजारबंद के लिए पुरानी साड़ी का किनारा फाड़ कर दो-तीन रुपये बचा लेती है….. एक रात वह सपने में कसमसाते हुए फुसफुसाती है- राकेश क्या कर रहे हो! छोड़ो कोई देख लेगा….उसकी शादी विनोद से हुई होती है…..
इधर देख रहा हूं कि प्रेम विवाहों का आँकड़ा बढ़ा है। शादी होते ही लव स्टोरी का समापन हो जाता है। किसी भी सफल प्रेमकथा पर आज तक न कविता लिखी गई न महाकाव्य। नाटक भी उस पर किसी ने नहीं लिखा। फिल्मकारों को भी उस पर पिक्चर बनाने की नहीं सूझी। सर्वमान्य तथ्य है कि संसार में वही प्रेम कथाएँ अमर हैं और बार-बार गाई जाती हैं जो वास्तव में असफल रहीं। बिछोह के घाव पर से हम पपड़ी उधेड़कर उसे फिर ताजा कर लेते हैं…… शादी हो गई होती तो हीर रांझे से पिट रही होती-‘मैं ही पागल थी तुममें न जाने क्या देख लिया, एक से एक रिश्ते आ रहे थे‘……. रोती -कुढ़ती एक दिन खामोशी से गुजर जाती। फिर न कोई हीर गाता, न इस प्रेम कहानी पर पिक्चरें बनतीं…… जब हम प्रेम में होते हैं, तब जैसी उष्मा और अनुराग एक दूसरे के प्रति महसूस करते हैं, शादी के बाद वह कहाँ बिला जाता है और क्यों ? इसमें स्थायित्व क्यों नहीं होता! समय बीतने के साथ-साथ यह पुरानी शराब की तरह और ज्यादा मादक क्यों नहीं होता ? क्यों यह सस्ती दारू की तरह झम्म से सिर चढ़ता है, बुखार की तरह हौले से उतर जाता है, पता तक नहीं चलता! कभी तो शक-सा होता है कि प्रेम नाम की कोई चीज है भी या यूँ ही शोर है! कोई भी सार्थक और सकारात्मक चीज जब इतनी कम उम्र पाती है तो देख कर अफसोस होता है।
हाल ही में दिवंगत हुए हबीब तनवीर की कविता काफी पहले पढ़ी थी। जिसमें कहा गया था कि एक आम आदमी अपनी पूरी जिन्दगी भर कपड़ा इतने गज पहनता है, बाल इतने गज कटवाता है, नाखून इतने फीट काटता है, अनाज इतना मन खाता है……..(सबके आगे एक संख्या थी) और प्यार करता/पाता है कुल इतना-सबसे कम, बेहद कम………
यह सब बातें इसलिए कि कुछ भूतपूर्व प्रेमियों से परिचित हूँ जो अब पति-पत्नी हैं, कुछों के बारे में सुनने को मिलता है। शादी से पहले उन्होंने जिद्दी बच्चों की तरह पाँव पटक दिए, लोट-पोट हो गए कि जहर खा लेंगे, जोग ले लेंगे ‘अगर न मिलीं तुम तो‘……..पूरी दुनिया को पेट्रोल छिड़ककर जला देने की बात करते थे, जमाने को जूते की नोक पर रख लिया।
फिर शादी हो गई। आज देखता हूँ कि वे पूर्व प्रेमी कभी-कभार मौका अगर मिले तो यहाँ-वहाँ जायका बदल लेने को बुरा नहीं मानते-रूटीन से बोर होकर कभी रेस्त्रां में डिनर कर लेने की तरह………
प्रेमिका जब पत्नी बनती है तो प्रेमिका नहीं रह जाती। और हैरानी की बात कि उसे वर्षों तक इस बात का गुमान तक नहीं होता। कुछों को तो जिन्दगी भर इस सच्चाई का पता नहीं चलता। शायद वे ही ज्यादा सुखी रहती होंगी। क्योंकि कई मामलों में जानने से ज्यादा बेहतर न जानना होता है। तो साहब कुल मिलाकर आज तक न तो किसी को अपने ख्वाबों का हूबहू शहजादा मिला न शहजादी। प्रेम शायद धतूरा है कि खाइए तो बौराइए, न खा पाए तो भी बौराइएगा। मुकेश साहब बस यूँ ही दिल बहलाने को गाना गा गए कि हाँ तुम बिल्कुल वैसी ही हो जैसा मैंने सोचा था……. वैसे भी रील लाइफ और रियल लाइफ में धरती आसमान का अंतर होता है। तो लड़कियाँ रोती हैं विदाई के समय तो ठीक ही रोती हैं और बाद में शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग देखते हुए हँसती हैं तो क्या बुरा करती हैं ? अपनी नासमझी और नादानियों पर रोने की बजाए हँसना हिम्मत का काम है, दिलेरी है। और लड़कियाँ बेशक दिलेर होती हैं। वर्ना माँ-बाप के कहने पर एक अनजान आदमी के साथ जीवन भर के सफर पर यूँ आँख मूँद कर नहीं चल देतीं।
jai ho sambhooo.बगैर शादी किये इतना तजुर्बा
राणा जी वाह वाह क्या वर्णन है शादी का सच में जरा सा विडियो ग्राफी का और लोगो के इतर लगाने का भी वर्णन होता तो मजा ही आ जाता लगता की बैठे बिठाये शदी देख रहे हैं.