बीते वर्ष 18 अगस्त को सुमगढ़ के सरस्वती शिशु मंदिर में 18 नौनिहालों की मृत्युका एक साल पूरा हो गया। इस हादसे की बरसी पर बागेश्वर के श्रमजीवी पत्रकार संगठन ने एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुँचे बागेश्वर के जिलाधिकारी सी.एस. नपलच्याल ने जिस तरह अपना दर्द छलकाया, उसके निहितार्थ समझने जरूरी हैं।
जिलाधिकारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि सुमगढ़ हादसे की पुनरावृत्ति रोकने के लिये कड़े कदम उठाने होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि बागेश्वर जिले में खडि़या का खदान प्राकृतिक आपदाओं का एक बड़ा कारक है। रीमा और काण्डा क्षेत्र में सड़कों के दोनों किनारों पर लगे खडि़या के कट्टों के ढेरों से सड़कें गलियाँ बनकर रह गयी हैं। बेलगाम खनन से पहाड़ अंदर तक हिल गये हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह कि भविष्य में उनके सामने आगे खडि़या खनन की लीज की जो फाइलें आयेंगी, उन्हें वह आगे नहीं बढ़ने देंगे। अर्थात् अब आगे से वे खडि़या खनन स्वीकृत नहीं करेंगे। अब या तो जिलाधिकारी पत्रकारों के इस आयोजन के बहाने एक कड़क अधिकारी की छवि बनाना चाहते थे या उन्हें इतना आत्मविश्वास होगा कि वे अपने इस निर्णय को वास्तव में क्रियान्वित कर ही लेंगे ?
यदि जिलाधिकारी वास्तव में ऐसा कर पाये तो यह बागेश्वर जिले को बचाये जाने के लिये एक रचनात्मक कदम होगा। परन्तु सवाल है कि यदि नई खानें स्वीकृत नहीं भी होतीं तो क्या पहले से चल रही खदानों में नियम और शर्तों का अनुपालन कराया जा सकेगा ?
बागेश्वर की खडि़या खान मालिकों के लिये ही नहीं, सरकार, प्रशासन और मीडिया के लिये भी वरदान है। खडि़या के खोदने वाले अखबारों के आइकन्स होते हैं। कार्पोरेट मीडिया में विज्ञापन बटोरने की अंधी होड़ के चलते बागेश्वर में बीते लगभग एक दशक से खोजी पत्रकारिता का अभाव हो गया है। सच कहा जाये तो यहाँ पत्रकारिता की आत्मा ही मर चुकी हैं। सुमगढ़ हादसे के बाद के इस एक वर्ष में प्रभावित परिवारों पर क्या बीती, यह कभी मीडिया की सुर्खी नहीं बना। हालाँकि आपदा के दौरान मुख्यमंत्री के दौरे को ग्लैमरस बनाने में मीडिया ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।