रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की भाजपा सरकार ने एक साल पूरा कर लिया है। औपचारिक पार्टी या सरकारी विज्ञप्तियों से इतर इस एक साल में क्या ऐसा कुछ हुआ है, जिस पर सरकार गर्व करे या कि जनता संतोष का अनुभव करे ? नवम्बर 2000 में राज्य का गठन होने के बाद मोहभंग का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह पिछले बारह महीनों में भी थम नहीं सका है। कहने को निशंक हरिद्वार के ‘कुम्भ 2010’ को अपनी सफलता मान रहे हैं। कुम्भ बहुत शान्ति से निपटा भी, लेकिन इसमें ऐसा क्या था सिवाय व्यवस्था बनाने के जिस पर इतराया जा सके। कुम्भ तो वैसे भी हजारों साल से होते रहे हैं। छिटपुट और दबे हुए ही सही, फिजूलखर्ची तथा भ्रष्टाचार के आरोप भी कुम्भ को लेकर सुनाई दिये ही। कुछ समय पूर्व हमें लगता था कि ‘108’ उत्तराखंड सरकार के अद्भुत सोच का नमूना है। फिर मालूम पड़ा कि यह व्यवस्था तो देश के अनेक राज्यों में चल रही है।
दरअसल प्रदेश की मूलभूत समस्याओं की समझ और उन्हें सुलझाने का संकल्प निशंक ने भी नहीं दिखाया। हालाँकि उनसे ऐसी उम्मीद थी। वे एक बहुत गरीब पृष्ठभूमि से आये हैं और राजनीति में भी अपना कद धीरे-धीरे बढ़ाते रहे हैं। न तो वे ठेकेदारी से अनाप-शनाप पैसा कमा कर सत्ता के शीर्ष पर आये और न ही किसी बड़े हेवीवेट के पिछलग्गू बन कर। अपने राजनीतिक चातुर्य और मिठबोलेपन का कुशलतम उपयोग कर ‘फर्स्ट एमंग ईक्वल्स’ (बराबरी वालों में श्रेष्ठ) के रूप में उन्होंने सत्ता पर कब्जा किया। लेकिन फिर वे भी जनता से कट गये और उसी नौकरशाही के जंजाल में फँस गये, जिसने राज्य अधिनियम में व्यवस्था न होने के बावजूद देहरादून में राजधानी बिठा कर वर्ष 2000 से ही उत्तराखंड का कबाड़ा कर रखा है। दरअसल यह राज्य गठन के मौके पर गलत रास्ते पर मुड़ जाने का दुष्परिणाम है कि अनवरत जनसंघर्षों की पृष्ठभूमि के बावजूद उत्तराखंड आज अमन-चैन का पर्याय नहीं, बल्कि समस्याओं का पहाड़ बन गया है। निशंक हों या कोई और, जब तक गैरसैंण को राजधानी घोषित करने के साथ प्रदेश की मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का साहस नहीं दिखाते, इस प्रदेश का भविष्य यों ही अधर में लटका रहेगा।
























अक्षरशः सहमत