ईश्वर जोशी
संसद में पेश किये जा चुके ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011’ के मसौदे को राजनैतिक दलों, नागरिक समूहों एवं बुद्धिजीवियों ने सिरे से खारिज कर दिया है। विधेयक में छिटपुट योजनाओं के जरिये खाद्य सुरक्षा जैसे गंभीर समस्या का सतही हल ढूँढने का प्रयास किया गया है। वैश्वीकरण के दौर में पिछले दो दशकों से सरकार बड़ी तेजी से प्राकृतिक संसाधनों से समुदायों को बेदखल कर उन्हें सुनियोजित तरीके से बड़ी-बड़ी कम्पनियों को सौंप रही हैं, जो खाद्य संकट का प्रमुख कारण है। खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाना तथा उन्हें नष्ट होने से बचाना देश की पहली जरूरत है, लेकिन मौजूदा विधेयक इस अहम् मुद्दे पर मौन है। विधेयक में कहा गया है कि ’’यह विधेयक जनसाधारण को गरिमामय जीवन व्यतीत करने के लिए सस्ती कीमतों पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण खाद्य की सुलभता सुनिश्चित कर मानव जीवन चक्र में खाद्य और पोषण सुरक्षा उपलब्ध कराने के मकसद से पेश किया जा रहा है।’’ स्पष्ट है कि इसमें खाद्य सुरक्षा के मूलभूत पक्षों को दरकिनार कर बाजार पर निर्भरता बढ़ाने की व्यवस्था की गयी है। बच्चों एवं महिलाओं को नजरअंदाज किया गया है। डिब्बाबंद भोजन का उल्लेख कर आपूर्ति की व्यवस्था निजी कंपनियों को सौंप दिये जाने की संभावनायें विधेयक में मौजूद हैं।
विधेयक कहता है कि बी.पी.एल. परिवारों को प्रति व्यक्ति प्रति माह 7 किलो तथा ए.पी.एल. परिवारों को 3 किलो राशन सस्ती दर पर उपलब्ध कराया जायेगा। तो पाँच सदस्यों वाले किसी बी.पी.एल परिवार को माह में 35 किलो तथा ऐसे ए.पी.एल. परिवार को माह में मात्र 15 किलो अनाज ही मिल पायेगा, जबकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मानकों के अनुसार पाँच सदस्यीय परिवार को माह में 49 किलो अनाज की जरूरत होती है। बी.पी.एल के लिए यह दर दो रुपया प्रति किलो गेहूँ तथा तीन रुपया प्रति किलो चावल होगी, जबकि ए.पी.एल. के लिए गेहूँ व चावल की कीमत उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधे से अधिक नहीं होगी। विधेयक केवल मोटे अनाज की बात करता है, जबकि तेल व दाल के बिना खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है। सामाजिक संगठनों द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दाल, तेल उपलब्ध कराने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य व भोजन का आधार बी.पी.एल., ए.पी.एल. न मान कर इनका सर्वव्यापीकरण करने की माँग की जा रही है। इस कानून का थोड़ा-बहुत फायदा सिर्फ उन्हीं परिवारों को मिलेगा, जिन्हें सरकार गरीब मानती है, हालाँकि सरकार के गरीबी के अनुमान कभी भी वास्तविकता के करीब नहीं होते। 1996 में भारत में 36 प्रतिशत परिवारों को गरीब माना गया था और 2002 में 26 प्रतिशत को। इन 5 वर्षों में ऐसा क्या चमत्कार हुआ कि गरीबी 10 प्रतिशत कम हो गयी, जबकि देश में भुखमरी बढ़ रही थी, रोजगार के अवसर कम हो रहे थे, कुपोषण में गिरावट नहीं हो रही थी ? पी.यू.सी.एल. की पहल पर सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद केन्द्र सरकार को विवश होकर मानना पड़ा कि गरीबों की संख्या 36 प्रतिशत पर बरकरार है। यह आँकड़ा भी सही नहीं माना जा सकता। यू.पी.ए. सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की 2005-06 में आयी रिपोर्ट के अनुसार देश में 77 प्रतिशत से ज्यादा लोग प्रतिदिन 20 रुपये से कम में गुजर कर रहे है। भोजन के अधिकार से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पूर्व जज डी. पी. वाधवा समिति ने सुझाव दिया है कि जिस भी नागरिक की आय 100 रु. रोज से कम हो, उसे भोजन का अधिकार के कानून का लाभ मिलना चाहिए। वर्तमान में योजना आयोग ने गरीबी का मानक ग्रामीण क्षेत्र में 26 रु. तथा शहरी क्षेत्र में 32 रुपया प्रतिदिन माना है। इसी आधार पर देश में सामाजिक, आर्थिक एवं जाति जनगणना का कार्य प्रारम्भ हो चुका है। बी.पी.एल. का कोटा सर्वेक्षण से पूर्व ही तय कर दिया गया है। उत्तराखण्ड के लिए यह कोटा 30.5 प्रतिशत है। इसमें ग्रामीण क्षेत्र को कोटा 35.1 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र का 26.2 प्रतिशत है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा हेतु चलाई जाने वाली योजनाओं से खाद्य सुरक्षा कैसे संभव होगी ?
प्रस्तावित विधेयक में कुपोषण से निपटने का काम आई.सी.डी.एस. तथा मध्यान्तर भोजन सरीखी योजनाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है। कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें पोषाहार देने की बात कही गयी है। गैर सरकारी संस्था नंदी द्वारा जनवरी 2012 में जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 42 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारतीय है। प्रधानमंत्री इसे राष्ट्रीय शर्म का विषय बताते हुए कह चुके हैं कि कुपोषण से निपटने हेतु केवल आई.सी.डी.एस. पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। बावजूद इसके प्रस्तावित विधेयक इस मसले पर गंभीर नहीं है। मातृत्व हक के रूप में प्रसव पश्चात् छः माह तक महिला को प्रति माह 1000 रु. की सहायता का एक अच्छा प्राविधान विधेयक में अवश्य है। मगर यह डर बना है कि कहीं योजना बनाते समय सरकार इसमें बी.पी.एल. अथवा दो बच्चों की शर्त न डाल दे। आर्थिक सहायता राशि को महंगाई सूचकांक के साथ जोड़ा जाना जरूरी है। राशनकार्ड महिला के नाम जारी किये जाने के प्रावधान की सराहना की जानी चाहिए। विधेयक में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के नाम पर खाद्यान्न के बदले नकद हस्तारण अथवा खाद्य कूपन जैसी स्कीमें आरम्भ करने की बात कही गयी है, जो खतरनाक है। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमजोर करने की साजिश है। शिकायत निवारण तंत्र के नाम पर विधेयक में एक कमजोर व्यवस्था दी गयी है। जिला स्तर पर जिला शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति करने तथा राज्य स्तर पर राज्य खाद्य आयोग के गठन की व्यवस्था दी गयी है।
वास्तव में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 खाद्य सुरक्षा विधेयक न होकर सेवा प्रदाता विधेयक है। विधेयक पर सुझाव देने हेतु सरकार द्वारा 20 जनवरी 2012 अन्तिम तिथि नियत की गयी थी, लेकिन अधिकांश राज्यों में सरकार ने इस आशय का विज्ञापन देना भी जरूरी नहीं समझा। उत्तराखण्ड में संभवतया विधानसभा चुनावों के कारण लगी आचार संहिता के चलते इसका विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया गया। बावजूद इसके राज्य के कई सामाजिक संगठनों ने संसदीय समिति को सुझाव भेजे हैं। इन सुझावों में किसी भी विकास परियोजना, जो खाद्य संकट को बढ़ाती हो, पर तत्काल रोक लगाने, कृषि भूमि का गैर कृषि कार्यों हेतु उपयोग प्रतिबंधित करने, जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा हेतु कारगर उपाय करने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत तेल व दाल उपलब्ध कराने, अनाज की मात्रा बढ़ाने, न्याय पंचायत स्तर पर गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न गोदामों की तथा विकासखण्ड स्तर पर कोल्ड स्टोरेज की स्थापना करने, डिब्बाबंद अथवा पैकेट बंद भोजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने, राज्य से गाँव तक एक प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था बनाये जाने, विधेयक में उल्लेखित प्राविधानों का उल्लंघन को गैर जमानती जुर्म घोषित करने तथा दोषियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करने की व्यवस्था किये जाने की माँगें प्रमुख हैं।