खण्डूरी सरकार द्वारा वर्ष 1893 की अधिसूचना के निरस्तीकरण से कृषि भूमि का विस्तार हो सकेगा और सरकारी योजनाओं के लिये काश्तकरों की नाप जमीन का उपयोग बन्द हो जायेगा। मगर अड़चनें बहुत सारी हैं। इस मुद्दे को समझने के लिये संक्षेप में पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है।
औपनिवेशिक अग्रेज सरकार ने उत्तराखंड में निजी मिल्कियत के योरोपीय सिद्धान्त पर भूमि बन्दोबस्त शुरू किया। भू राजस्व को बढ़ाने के लिये ट्रेल द्वारा वर्ष 1823 (संवत् 1880) मैं की गई पहली बन्दोबस्ती ‘अस्सी साला’ के नाम से आज भी याद की जाती है। इसमें गाँव की सिर्फ सीमाएँ अंकित की गयीं और राज्य तथा गाँव समाज के अधिकार को पृथक कर दिया गया। गाँव की सीमा के भीतर कृषि और गैर कृषि भूमि के रूप में जमीन का वर्गीकरण कर दिया गया। गैर कृषि भूमि के कुछ हिस्से बंजर थे, जहाँ कृषि क्षेत्र बढ़ाये जाने की सम्भावनायें थीं तो कुछ चारागाह, श्मशान, मन्दिर आदि सामुदायिक प्रयोजन के रूप में थे। अधिक राजस्व प्राप्त करने की नीयत से बंजर को कृषि योग्य (कटील और इजरान से अव्वल और दोयम) बनाने के प्रयास शुरू हुए। तब खेती के साथ पशुपालन खूब था। पशुओं की जरूरत दूध-दही से ज्यादा गोबर यानी खाद के लिये था। झूम खेती भी कुछ हद तक मौजूद थी, जहाँ एक साल जमीन के एक हिस्से मे खेती कर अगले वर्ष उसे बंजर छोड़ दिया जाता था। जानवर इन जमीनों को पुनः उर्वरता देते थे।
1850 के बाद रेल की पटरियों को बिछाने, नदी मार्ग से लकड़ी के ढुलान और लीसे का व्यावसायिक उपयोग ने जंगलों को एकाएक महत्वपूर्ण बना दिया। जमीन भी चाय की खेती के अनुकूल निकली। इंग्लैंण्ड के समान जलवायु वाले उत्तराखण्ड में बसने तथा यहाँ की जमीन और जंगलों से मुनाफा कमाने के लिये अंग्रेज लालायित हो उठे। फलस्वरूप लोगों के वन अधिकारों मे कटौती कर वनों को सरकारी सम्पत्ति बनाने का सिलसिला आरम्भ हुआ। अग्रेजों का भूस्वामित्व स्टेट (व्यक्तिगत) के रूप में भी बढ़ने लगा। इन्हीं कारणों से वर्ष 1893 मैं एक आदेश पारित किया गया। अधिसूचना संख्या 869-ए/638 दिनांक 17-10-1823 के द्वारा भारतीय वन अधिनियम संख्या 7 सन् 1878 की धारा 28 के अधीन अधिनियम का अध्याय 4 (प्रोटेक्टेड फारेस्ट से सम्बंधित प्राविधान, गढ़वाल, अल्मोड़ा व सबडिविजन नैनीताल के आरक्षित वन) रिजर्व फारेस्ट से बाहर की ऐसी वन भूमि और बंजर भूमि पर लागू किया गया जो कि आरक्षित वन नहीं थे। गाँव की नाप भूमि में सम्मिलित नहीं थे और उसमें सीमांकित रक्षित वन (डिमार्केटेड प्रोटेक्टेड फारेस्ट) भी नहीं थे। इस प्रकार अधिसूचित बेनाप भूमि 1893 से विधिक रूप से रक्षित वन हो गये। सरल शब्दों मे कहा जाये तो गाँव की सीमा के भीतर नाप कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सभी तरह की भूमि वन के रूप में बदल गयी। बद्रीदत्त पांडे ने ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में जिक्र किया है कि 1893 में राजाज्ञा निकाली गई कि नाप जमीन के अलावा जितनी बेनाप, ऊसर, बर्फानी, नदी-तालाब, चट्टान, गाड़-गधरे, जंगल, नजूल आदि जमीनें हैं, वह सब सरकारी हैं। प्रजा का उन पर कोई अधिकार नहीं है।
वर्ष 1929 मैं लागू वन अधिनियम द्वारा वन अधिनियम 1878 को निरस्त कर दिया गया था। वर्ष 1960 मैं कुमाऊँ जमींदारी अधिनियिम भी लागू हुआ। वर्ष 1956 से लेकर 1961 तक चली अन्तिम बन्दोबस्ती मैं सभी प्रकार की जमीनें नापी गयीं और जमीन की श्रेणियाँ बनायी गयी। गाँव के भीतर की बंजर जमीन कूजा एक्ट के अनुसार राजस्व खातों में राज्य के नाम पर अंकित की गयीं, हालाँकि जनमानस मैं यह बेनाप या यू.पी. लैण्ड के नाम से ही जिन्दा रही। इस दौर में 1893 की अधिसूचना का किसी को ध्यान भी नहीं रहा। सरकार द्वारा इस बेनाप जमीन के पट्टे भूमिहीनों में वितरित किये। सरकारी ढाँचागत सुविधाओं का विस्तार इसी जमीन पर हुआ।
वर्ष 1980 में वन (संरक्षण) अधिनियम में वन भूमि में गैर कृषि उपयोग पर रोक लग गयी। वन भूमि पर किसी भी गैर वानिकी कार्य के लिये केन्द्र सरकार की स्वीकृति अनिवार्य हो गयी। परन्तु बेनाप जमीन पर राज्य सरकार का स्वामित्व होने के कारण इसे वन सरंरक्षण अधिनियम के बाहर माना गया। इसका उपयोग पहले की ही तरह होता रहा। वर्ष 1998 मैं सर्वोच्च न्यायालय में बहुचर्चित गोंडाबर्मन बनाम भारत सरकार का मामला आरम्भ हुआ, जिसमें दिये गये एक फैसले में कहा गया कि कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के उपबंध सभी तरह की वन भूमियों में लागू होंगे, भले ही उस पर स्वामित्व किसी का भी हो। इसके अनुपालन मे दिनांक 14 फरवरी 1997 तत्कालीन उ.प्र. के प्रमुख सचिव पी.एल. पूनिया द्वारा एक आदेश जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि वर्ष 1893 मैं लागू अधिसूचना समाप्त नहीं हुई है। अतः कृषि भूमि को छोड़कर सभी तरह की भूमि वन भूमि है।
इस आदेश ने उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया। ढांचागत सुविधाओं के लिये बेनाप जमीन मिलनी बन्द हो गई और कृषि भूमि दान के रूप में लेने की जरूरत पड़ने लगी। दलितबहुल गाँवों में जमीन की कमी के कारण स्कूल, अस्पताल आदि बनाने ही असम्भव हो गये। लगभग सर्वत्र लोगों के पास कृषि भूमि के अतिरिक्त बेनाप भूमि भी थी। वे आस लगाये बैठे थे कि अगली बन्दोबस्ती में यह उनके नाम पर भूमिधरी मैं आ जायेगी। वर्ष 1956 की बन्दोबस्ती मैं खेतों की नपाई तो हुई थी, परन्तु खेतों के बीच के भीड़े नहीं नापे गये थे। ये भीड़े भी अब वन भूमि में बदल गये थे।
वर्ष 2002 मैं सुप्रीम कोर्ट का पुनः आदेश आया कि सभी प्रकार की वन भूमि से अवैध कब्जे तत्काल हटाये जायें। उत्तराखंड के काश्तकार इस आतंक में जीने लगे कि उन्हें कभी भी उनकी जमीन से बेदखल किया जा सकता है। कई आपदाग्रस्त गाँवों के लोगों का विस्थापन होना था, मगर जमीन कहाँ थी ?
हमने ‘उत्तराखण्ड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा’ के रूप में इस विषय पर लगातार जन जागरण किया। परन्तु जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को समझने मैं असमर्थ रहे। नौकरशाह उन्हें सुप्रीमकोर्ट का भय दिखाते रहे। आर, एस. टोलिया अवश्य एक अपवाद रहे। कुमाऊँ कमिश्नर के रूप में उन्होंने सिविल भूमि पर वन पंचायतें बना कर उसे लोगों के अधिकार मैं लाने का प्रयास किया। परन्तु 1893 के वन अधिनियम को निरस्त कराने की पहल वे भी नहीं कर सके। पिछले वर्ष की भीषण आपदा के बाद मुख्यमंत्री निशंक द्वारा इस मामले को मुख्य वन संरक्षक और न्याय विभाग को परीक्षण के लिये भेजा गया। अब वर्तमान सरकार द्वारा इस आदेश को निरस्त किये जाने के पश्चात् भूमिहीनों और बेनाप जमीन पर काबिज लोगों को पुनः पट्टे मिल सकेंगे तथा विकास कार्यों के लिये जमीन की कमी नहीं होगी।
हालाँकि वनों का मसला समवर्ती होने तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के कारण यह निरस्तीकरण पूरी तरह लागू हो पायेगा, इस बात में अभी शंका है। पंजाब की श्यामलात जमीनों का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ ऐसी जमीन को गैर वन भूमि घोषित करने में कई तरह की अड़चनें आईं जबकि उन जमीनों पर हमेशा से खेती होती आ रही थी। अतः अन्तिम रूप से इस मसले की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में ही करनी होगी। अतः जरूरत है बहुत अधिक तैयारी की। इस महत्वपूर्ण कार्य को सिर्फ अधिकाररियों के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। वन और भूमि के मुद्दों पर कार्य कर रहे सभी लोगों को इससे जुड़ना होगा।