पुराणों के अनुसार जागेश्वर शिव की तपस्या का स्थान है। दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस कर सती की राख लपेटकर झाँकरसैम में शिव ने तपस्या की थी। उस समय झाँकरसैम व जागेश्वर देवदारु वृक्षों से आच्छादित थे। वशिष्ठ मुनि अपनी पत्नियों के साथ जागेश्वर में रहते थे। कहा जाता है कि यहाँ शिव मंदिर की स्थापना कत्यूरी राजा शालिवाहन ने की थी।विक्रमादित्य महान भी जागेश्वर आया और उसी ने मृत्युंजय मंदिर का जीर्णोद्धार किया था। बाद में शंकराचार्य ने देवदार के पेड़ों को हानि पहुँचाये बिना मंदिर को नया रूप दिया। फिर कत्यूरी राजाओं ने मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया। यहाँ पूजा सामग्री में पंचबलि यानी दूध, दही, घी, शहद और शक्कर सम्मलित होते हैं। यह तीर्थ संतान-प्रदाता शक्ति के लिये माना जाता है। पेड़ों का काटना यहाँ हमेशा निषिद्ध रहा, इसीलिये इस घने देवदारु वन में सूर्य की किरण तक प्रवेश नहीं कर पाती थीं। जाड़ों भर यह क्षेत्र बर्फ से ढँका रहता था। आज भी गर्मियों में भी यहाँ ठंड महसूस होती है। चंद राजाओं के शासन काल में इसने श्मशान घाट के रूप में प्रतिष्ठा पाई। राज परिवार के लोगों का अन्तिम संस्कार यहाँ किया जाता था, मगर अंत्येष्टि में जलने वाली लकड़ी के बदले 10 गुनी लकड़ी भावी पीढि़यों के लिये उपलब्ध रहे, इसके लिये देवदार के पेड़ों का संरक्षण किया जाता था।
जागेश्वर क्षेत्र में बलि निषेध हमारे पूर्वजों ने किया था, मगर आज वहाँ देवदार के पेड़ों की बड़ी निर्ममता से बलि दी जा रही है। इन दिनों जागेश्वर धाम अपने धार्मिक महत्व के लिये नहीं, देवदार के पेड़ों की तस्करी के लिये प्रसिद्ध हो गया है। जो लोग जागेश्वर मंदिर और आसपास के पवित्र वनों को बचाने के लिये जिम्मेदार हैं, वे ही उनका अवैध उपयोग कर रहे हैं। हाल के वर्षों में जो भी नौकरशाह अल्मोड़ा जनपद में तैनात हुआ, उसने जागेश्वर के देवदार के लकड़ी का उपयोग इमारत व फर्नीचर बनाने के लिये अवश्य किया। कुछ वर्ष पूर्व एक जिलाधिकारी ने लकड़ी का धन्धा करने वाले एक राजनीतिक दल के नेता से फर्नीचर बनाने के लिये देवदार का एक पेड़ काटने के लिये कहा। उस नेता ने एक के बदले चार पेड़ काट डाले। जब तहसीलदार ने इस तस्कर को पकड़ा तो उसने सीधे जिलाधिकारी से तहसीलदार की बात करा दी। मामला वहीं पर रफादफा हो गया। पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश में, लखनऊ में बनी यहाँ के एक पूर्व जिलाधिकारी को कोठी के लिये सारी इमारती लकड़ी नेताओं व तस्करों द्वारा जागेश्वर क्षेत्र से ही पहुँचाई गई।
देवदार के एक पेड़ की कीमत एक लाख से 5 लाख तक की होती है। देवदार के दस पेड़ काटने से जिन्दगी भर के लिये वारे-न्यारे हो जाते हैं। इसीलिये, कानून, नियम, वन विभाग, पटवारी आदि होने के बावजूद देवदार की तस्करी लगातार होती है। तो रुकनी नहीं है, क्योंकि ये सभी शक्तियाँ बचाने में नहीं, विनाश करने में अधिक सक्रिय हैं। जागेश्वर वन प्रभाग का वन माफिया तो भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय दलों, भाजपा व कांग्रेस से जुड़ा हैं। जमीनी स्तर पर ये नेता एक-दूसरे के विरोधी न होकर मददगार होते हैं। इसलिये प्रदेश स्तर के बड़े नौकरशाह ही इनका बाल बाँका नहीं कर सकते, छोटे कर्मचारियों से क्या आशा की जा सकती है ?
कुछ समय पहले तक जागेश्वर रेंज कौसानी से मुनस्यारी तक फैले अल्मोड़ा पूर्वी वन प्रभाग में था। तब इस प्रभाग के ईमानदार वनाधिकारी अनिल दत्त ने सारी तस्करी लगभग बन्द करा दी थी। इसके लिये उन्हें नेताओं, नौकरशाहों से डट कर संघर्ष करना पड़ा। आज पूर्वी वन प्रभाग अल्मोड़ा, जागेश्वर वन प्रभाग बन गया है लेकिन जागेश्वर रेंज सिविल सोयम वन अल्मोड़ा प्रभाग में आ गया है। वन संरक्षक कुमाऊँ का कार्यालय नैनीताल से अल्मोड़ा स्थानान्तरित हो गया है। लेकिन जंगल की तस्करी रुकी नहीं है। सबसे शर्मनाक घटना तो दो वर्ष पूर्व हुई जब वन संरक्षक अपने बंगले के अहाते से संरक्षित प्रजाति के चार पेड़ काट डाले। उस वन संरक्षक पर कोई कार्रवाही नहीं हुई। तब इस वन विभाग से क्या आशा की जा सकती है ?
पिछले एक माह में जागेश्वर रेंज के कोटेश्वर, मंतोला, महतारा, नैकिना, गोठ्यूड़ा के सिविल वन तथा आरक्षित वन क्षेत्र से तीन करोड़ रुपये से अधिक के देवदार के पेड़ कट गये हैं। यहाँ अधिकांश गधेरों में वन व राजस्व विभाग के कर्मचारियों को देवदार के लावारिस स्लीपर मिल रहे हैं। कटे हुए पेड़ों के ठूँठ भी साफ दिखाई दे रहे हैं, परन्तु पेड़ों को काटने वाला इन्हें नहीं दिखाई दे रहा है। अब तक एक भी व्यक्ति नहीं पकड़ा गया है। कटे हुए पेड़ के स्लीपर तमाम वन चौकियों को पार कर, अल्मोड़ा, बल्कि हल्द्वानी तक पहुँच गये। मगर वन चौकी वाले सब सोये रहे। यह भी उल्लेखनीय है कि वन चौकियों पर स्थायी कर्मचारियों को तैनात नहीं किया जाता है। सब अस्थायी कर्मचारी होते हैं। एक चौकी में तो एक विकलांग को बैठाया गया है।
वन तस्करों को पकड़ने के बजाय इन दिनों बहस इस बात पर चल रही है कि मामला वन विभाग का है या राजस्व विभाग का। दोनों एक – दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। वन अधिनियम 1980 के अनुसार अपने घर के पेड़ की हरी शाखा काटने पर भी ग्रामीणों को जेल भेज दिया जाता है। मगर इन तस्करों को वन विभाग पूरी तरह अनदेखा करता है। जागेश्वर क्षेत्र के इन तस्करों से आम आदमी बुरी तरह आतंकित है और मुँह खोलने से डरता है। राजनैतिक दलों से प्राप्त संरक्षण के चलते ये तस्कर तो पुलिस- पटवारी तक की धुनाई कर देते हैं। तब भी इन पर कार्यवाही नहीं होती। कभी भूले-भटके पकड़े गये तो कचहरी से भी आराम से छूट जाते हैं। अब तक उत्तराखंड लोक वाहिनी के अलावा किसी राजनीतिक दल ने इन तस्करों की निंदा नहीं की है। वाहिनी ने ही अभियुक्तों की गिरफ्तारी की माँग करते हुए 13 सितम्बर को गुरड़ाबाँज में धरना दिया। इससे विभिन्न राजनैतिक दलों में इन तस्करों की घुसपैठ का अनुमान लगाया जा सकता है। अलबत्ता, समाचार पत्रों ने इस प्रकरण पर खुल कर, विस्तार से लिखा। परन्तु कोई कार्यवाही तब भी नहीं हुई है।
इसी वन रेंज में, पनार घाटी में चिमतोली से बंगोली के बीच खैर के पेड़ों का जर्बदस्त कटान हो रहा है। क्या कांग्रेस के एक बड़े नेता द्वारा इस क्षेत्र में लगाई गई कत्था फैक्ट्री में इस लकड़ी का उपयोग हो रहा होगा, यह सवाल सब लोगों की जबान पर है। इस क्षेत्र के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ व चम्पावत की सीमा में होने का लाभ भी तस्करों द्वारा उठाया जा रहा है। यहाँ पनार नदी से जमकर रेता निकाला जा रहा है। पनार का रेता इस क्षेत्र में श्रेष्ठ माना जाता है। लगभग 20 ट्रक रोज रेता निकाला जा रहा है, मगर शायद एक ट्रक का रवन्ना भी वन विभाग नहीं काटता होगा। इस तरह एक ट्रक से ही तीन हजार रुपया तस्कर कमा रहे हैं।