पौड़ी जनपद के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में वृक्षों का अवैध कटान किस स्तर पर होता होगा, इसका अंदाज़ा सहज ही इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के मुख्यालय में ही वन विभाग की नाक के नीचे सैकड़ों पेड़ों पर आरी चला दी गयी और वन विभाग को भनक भी न लगी। या कहें कि विभाग जानते-बूझते भी आँखें मूँदे बैठा रहा।
पौड़ी शहर में गत पाँच वर्षों में वनसंरक्षक, प्रभागीय वनाधिकारी कार्यालय व जिलाधिकारी आवास के आसपास बिना वन विभाग की अनुमति के 900 से अधिक पेड़ों को धराशायी कर दिया गया। पूर्व में मुख्य विकास अधिकारी के पद पर रहे दिलीप जावलकर जब पुनः जिलाधिकारी के पद पर पौड़ी पहुँचे तो उन्हें जंगलों में पेड़ों की संख्या में कमी का एहसास हुआ और उन्होंने उप जिलाधिकारी व वन विभाग के अधिकारियों की टीम बनाकर जाँच करवाई। जाँच रिपोर्ट में चौंकाने वाले आँकड़े सामने आये। पौड़ी शहर की लगभग तीन किलोमीटर की परिधि में ही 919 हरे भरे देवदार, कैल, सुरई, काफल, बाँज व चीड़ के वृक्षों को काट डाला गया, जिसमें से जिलाधिकारी निवास के निकट ही 222 पेड़ हैं। कण्डोलिया रांसी पैदल मार्ग में 305 पेड़ काटे गए, जबकि कण्डोलिया रांसी मोटर मार्ग से सटे हुए जंगल में 170 पेड़ों का अब नामोनिशाँ ही नहीं है। कण्डोलिया में 174 पेड़ों के कटे हुए तने मिले हैं, जिसमें से कई पेड़ पिछले साल हिमपात व आंधी के कारण धराशायी हुए थे, जिन्हें वन विभाग से पहले ग्रामीण उठाकर ले गए।
प्रभागीय वनाधिकारी गढ़वाल वनप्रभाग के अनुसार उनके विभाग ने किसी भी पेड़ को काटने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन न ही किसी व्यक्ति का चालान काटा गया और न ही मुकदमा दर्ज करवाया गया और उस पर दलील यह है कि अकेले वन विभाग को ही दोषी ठहराना तो ठीक नहीं। यदि कण्डोलिया व रांसी के जंगलों में पेड़ों को काटा गया तो वन पंचायत, पुलिस और राजस्व विभाग भी तो जिम्मेदार हैं। बहरहाल आरोपों और प्रति-आरोपों के बीच ठीकरा एक वन पंचायत के सरपंच के सर पर फूटा और उसे निलंबित कर दिया गया। इस बाबत जिलाधिकारी दिलीप जावलकर का कहना है कि वनों की रक्षा में वन पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसमें पौड़ी की वन पंचायत पूर्णतया विफल रही और अब पौड़ी में स्थानीय निवासियों की समिति बनाकर जंगलों की रक्षा की मुहिम चलायी जायेगी। जिलाधिकारी के प्रयास कितने कारगर रहते हैं और जनता को कितना जागरूक कर पाते हैं, यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन मौजूदा आँकड़े तो आने वाले कल की वह भयावह तस्वीर दिखाते हैं, जिसका अहसास शहरवासियों को एक के बाद एक सूखते लगभग सभी प्राकृतिक स्रोतों के रूप में होने लगा है। पौड़ी शहर में कम वर्षा का एक कारण यह धीरे-धीरे कम होते जंगल भी हैं।
पर्यावरण के नाम पर कभी दिवस तो कभी सप्ताह में आयोजित गोष्ठियों, रैलियों और विज्ञापनों में लाखों के वारे-न्यारे कर आम नागरिकों को जागरूकता का संदेश देने वाला वन विभाग खुद ही सोया है। कागजी खानापूर्ति कर आम जनता से अपील करता है, लेकिन खुद अपने लिये कोई जिम्मेदारी तय नहीं करता। पिछले 5 सालों में लुप्त हो चुके तो 919 वृक्ष हैं, लेकिन वन विभाग के पास पिछले 5 वर्षों में गिनाने को किसी जंगल का कोई ऐसा कोना नहीं, जो इनके प्रयासों से पनपा हो। ऐसा प्रतीत होता है कि जंगलों की अपेक्षा कागजों में पौधों को ज्यादा सींचा जाता है। वन विभाग के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये को देख कर तो यही लगता है कि इन जंगलों को बचाने के लिये इनका न तो तन है और न ही मन। न ही पेड़ बचते हैं और न ही बचता है इन पेड़ों को बचाने के लिये मिला सरकारी धन।