कुछ समय पूर्व जागेश्वर क्षेत्र में 350 देवदार के पेड़ कटने का मामला कुछ दैनिक समाचार पत्रों द्वारा किये गये भंडाफोड़ और उत्तराखंड लोक वाहिनी द्वारा 13 सितम्बर को गुरड़ाबाँज में किये धरने के बाद (देखें नैनीताल समाचार, 15 से 30 सितम्बर 2011) अल्मोड़ा जनपद में एक चर्चित मुद्दा बन गया। परन्तु इसके बावजूद वन विभाग लम्बे समय तक इसे संरक्षित व सिविल वन का मामला बना कर दबाने की कोशिश करता रहा। दबाव अधिक बढ़ने पर एक फॉरेस्ट गार्ड को निलम्बित कर दिया गया तथा तीन लोगों- पूरन चन्द्र पाटनी, राजेश भट्ट व गोकुल पाण्डे को गिरफ्तार किया गया। लगता है कि इतनी सी कार्यवाही कर वन विभाग अपने अधिकारियों को बचाना चाहता है। अगर ऊँचे अधिकारियों को दण्डित नहीं किया गया तो देवदार के पेड़ों की तस्करी कुछ समय बाद पुनः आरम्भ हो जायेगी। क्योंकि यह बात गौर करने लायक है कि
वनों के धंधों में राजनैतिक नेता गले-गले तक डूबे हैं। कांग्रेस, भाजपा और सपा-बसपा ही नहीं, अपने को उत्तराखंडी कहने वाले किसी दल का भी कोई बयान जागेश्वर प्रकरण में पिछले दो महीनों में नहीं आया है।
अभी कुछ समय पहले अल्मोड़ा के भिकियासैण विकासखण्ड के सीम गाँव के क्षेत्रान्तर्गत भवानी देवी मंदिर के पास एक होटल व्यवसायी द्वारा ग्रामीणों से भूमि खरीदकर कॉटेजों को बनाना आरम्भ किया। इसके खिलाफ अवैध ढंग से सरकारी भूमि में रास्ता बनाने व बाँज के पेड़ काटने की शिकायत ग्रामीणों ने की। एसडीएम व तहसीलदार द्वारा जाँच करने पर पाया कि विवादित क्षेत्र में 121 पेड़ों के चोरी की पुष्टि तथा 16 हरे पेड़ गिराये जाने के प्रमाण मिले हैं। लेकिन ग्रामीणों को इस बात का गुस्सा है कि होटल मालिक के प्रभावशाली होने के कारण वन विभाग व राजस्व विभाग कोई कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। कोई साधारण ग्रामीण होता तो कब का जेल भेज दिया गया होता।
अल्मोड़ा वन विभाग का डी.एफ.ओ. राहुल देवदार के पेड़ काटने व लुटाने में इतना आमादा हैं कि इन्होंने एक प्रभावाशाली परिवार को शहर के अन्दर एन.टी.डी. मोहल्ले में मकान को खतरा बताकर पाँच बड़े देवदार के पेड़ काटने की अनुमति दे दी। उन्होंने इतना भी कष्ट नही किया कि मुआयना कर देख लेते कि खतरा है भी या नहीं। जब पेड़ कटने आरम्भ हो गये तो शहर में असंतोष फैला। मेथोडिस्ट चर्च से जुड़ी सुनीति सिंह ने जिलाधिकारी के अलावा मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर आरोप लगाया कि हीराडुंगरी में एक व्यक्ति ने मकान को खतरा बताकर पेड़ काट दिये हैं। राजस्व विभाग इस भूमि को सीतापुर निवासी सुषमा भार्गव की बता रहा है। जिलाधिकारी ने जन अंसतोष को ध्यान में रखकर तत्काल तहसीलदार पंकज उपाध्याय से जाँच करवाई। तहसीलदार ने अपनी जाँच रिपोर्ट में पाया कि तीन पेड़ो से खतरा है, लेकिन दो पेड़ों से कोई खतरा नहीं है। फिलहाल जिलाधिकारी ने जाँच पूरी होने तक यथास्थिति बनाये रखने को कहा है।
इस घटना से स्पष्ट है अब वन अधिकारी जो अब वन संरक्षक न रह कर वन भक्षक बन गये हैं। अधिकांश वनों का नाश इनके इशारे पर ही किया जा रहा है। अगर एक आम आदमी अपनी जरूरत के लिये एक सूखा पेड़ चाहता है तो उसेे एक-एक साल तक अनुमति नहीं देते। अगर किसी व्यक्ति के मकान को वास्तविक खतरा भी हो उसे भी परेशान करते हैं। मगर कुछ वर्ष पहले एक जज महोदय की इस शिकायत पर कि उनके बंगले में धूप नहीं आती, देवदार के अनेक बहुमूल्य पेड़ों को काट डाला गया। दो वर्ष पहले वन संरक्षक कुमाऊँ ने इस आधार पर कि उसके बंगले में बन्दर घुस आते हैं, संरक्षित प्रजाति के तुन के चार पेड़ काट दिये। तब भी उत्तराखंड लोक वाहिनी ने उस वन संरक्षक के विरुद्ध आन्दोलन किया था, लेकिन उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ।