15 से 30 अप्रेल के अंक के संपादकीय के द्वितीय पैराग्राफ की पहली तीन पंक्तियों ‘‘जंगलों की आग से होने वाले नुकसान की समीक्षा करना यहाँ मतलब नहीं है। यह एक कुदरती चीज़ है। अतः हो सकता है कि इससे प्रकारान्तर में जंगलों के पुनर्सृजन में कुछ मदद भी मिलती हो।’’ को कई बार पढ़ने के बावजूद मेरा दिमाग, चाहे जितना छोटा हो, यह मानने से इंकार कर रहा है कि आग लगना एक कुदरती घटना है। कोई भी आग चाहे वह घर में लगे, बाज़ार में लगे या फिर जंगल में लगे या तो जानबूझ कर लगती है या फिर आदमी की ही असावधानी से लगती है। इसे कुदरती घटना मान लेने से कई और घटनाओं को भी कुदरती मानना पड़ेगा। जैसे की ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन। प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दुरुपयोग के कारण जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी स्थितियाँ पैदा हुई है। अब यह कहना कि प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग एक कुदरती घटना है उतना ही गलत है जितना कि जंगल की आग को कुदरती घटना मानना गलत है। फिर गलत तो गलत है, उसका यशाशक्ति यथासंभव प्रतिकार करना हम आपसे ही सीख रहे हैं।
महोदय, उत्तराखंड राज्य के बड़े आंदोलनकारियों में आपकी गिनती होती है। ‘नदी बचाओ’ जैसे अभियानों के आप अगुवा हैं तथा हम जैसे लोगों, जो पहाड़ के पुराने मिश्रित वनों को याद कर कर रोते रहते हैं, की उम्मीदों के केन्द्र भी आप ही हैं। यदि आप ही जंगल की आग को कुदरती घटना मानने लगेंगे तो फिर हमारा सारा वैचारिक आधार ही हिल जायेगा। वन विभाग तो इसे कुदरती घटना का जामा पहनाने को तैयार बैठा है, आप जैसे लोगों के इस तरह के विचारों का वहाँ पर हाथों-हाथ स्वागत किया जायेगा। फिर तो हम लड़ भी नहीं पायेंगे।
‘जंगल की आग से प्रकारान्तर में जंगलों के पुर्नसृजन में मदद मिलती हो’ पर मुझे आपत्ति है। बेशक मैं एक साधारण आदमी हूँ कोई पर्यावरणविद नहीं, मगर फिर भी कहना चाहूँगा कि चीड़ के जंगलों में हर साल लगने वाली आग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट होती रहती है। मिट्टी की रासायनिक संरचना बदलती है, मिट्टी की बँधे रहने की योग्यता समाप्त हो जाती है। वह स्थान, जहाँ पर आग लगे घास-फूस जैव विविधता सब नष्ट हो जाती है। वहाँ पर फिर केवल शुष्क जगह पर उगने वाली प्रजातियाँ जैसे कैक्टस, नागफनी, कूरी और भी नामालूम कितनी रेगिस्तानी प्रजातियाँ उगती हैं। अल्मोड़ा आते समय काकड़ीघाट से लेकर क्वारब पुल तक कोसी नदी के समानान्तर पाँच सौ मीटर चौड़ी पट्टी में आप उपरोक्त वर्णित रेगिस्तानी प्रजातियाँ देख सकते हैं। यह पट्टी धीरे-धीरे ऊपर को बढ़ रही है। मिश्रित प्रजाति के जंगलों में चीड़ के प्रवेश के बाद आग लगने का जो सिलसिला शुरू होता है, वह चौड़ी पत्ती प्रजाति के छोटे बड़े वृक्षों, झाड़ियों, जैव विविधता, जीव जन्तुओं के खात्मे और विशुद्ध चीड़ के जंगलों से होता हुआ कैक्टस कूरी, नागफनी आदि के बीहड़ पर जाकर रुकता है। यह पुनर्सृजन नहीं विनाश ही कहलायेगा।
महोदय, आज जो भी अशान्ति, असंतुलन, परेशानियाँ समाज में दिख रही है, उसका मूल कारण आदमी का लालच तथा येनकेन प्रकारेण धन इकट्ठा करने की प्रवृत्ति उत्तरदायी हैं। इन सबका खामियाजा हम भुगत रहे हैं तथा आने वाली पीढ़ियाँ भी भुगतेंगी। आप और हम अपनी-अपनी ताकत के हिसाब से जितना चाहें चिल्लायें, जोर लगायें, स्थितियाँ बदलेंगी तभी, जब हमारे भाग्यविधाता बन बैठे नेता तथा अफसरशाह पैसे की दौड़ छोड़कर त्याग व सेवा की ओर अग्रसर होंगे। मगर उनके बदलने का इंतज़ार न करते हुए हमें अपना काम तो करना ही पड़ेगा। और वह कार्य आप बखूबी कर भी रहे हैं।
गजेन्द्र कुमार पाठक
शीतलाखेत

























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