पर्यावरण की उलटबांसियाँ – 2
इस साल उत्तराखण्ड के जंगल बहुत अधिक जले हैं। पिछले सालों में भी आग लगती थी, पर मई या जून की शुरूआत में बारिश हो जाने से नुकसान उतना नहीं होता था। उत्तराखण्ड का वन विभाग बड़े गर्व के साथ घोषणा करता है कि उत्तराखण्ड के 65 प्रतिशत से अधिक भू भाग में वन हैं और वह उनका स्वामी है। 65 प्रतिशत!…….एक तरह से वही उत्तराखण्ड की भूसम्पदा का असली मालिक है। यह भी सच्चाई है कि उत्तराखण्ड का समग्र अस्तित्व प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वनों पर ही निर्भर है। इसलिए वनों की अव्यवस्था आम जनता की चिंता का कारण बनती है। साल भर जंगलों से चोरी-तस्करी, वन्य जीवों के शिकार की खबरें अखबारों में छायी रहती हैं और गर्मियाँ आते-आते बचे खुचे जंगल आग की भेंट चढ़ जाते हैं। इस सालाना घटनाक्रम के बाद एक जागरूक नागरिक के मन में यही सवाल उठता है कि क्या वन विभाग अपना उत्तरदायित्व निभाने में सक्षम है ?
वन विभाग के संगठनात्मक ढाँचे पर एक नजर डालें। नब्बे के दशक की शुरूआत तक उ.प्र. में विभाग का मुखिया एक मुख्य वन संरक्षक होता था। अब उत्तराखण्ड में मुख्य वन संरक्षक से भी ऊपर के आधा दर्जन से अधिक पद सृजित हो चुके हैं, जिन्हें प्रमुख वन संरक्षक व अपर प्रमुख वन संरक्षक का नाम दिया गया है। मुख्य वन सरंक्षकों के भी कई पद बढ़ा दिये गये हैं। प्रमुख व मुख्य वन संरक्षकों की संख्या दो दर्जन तक पहुँच गई है। यानी कि इतने बड़े अविभाजित प्रदेश से छोटा सा उत्तराखंड बनने के बाद उच्च स्तर के पदों में 24 गुना वृद्धि! बात यहीं पर नहीं रुकती। प्रादेशिक वन सेवा, जिससे सहायक वन संरक्षकों की भर्ती होती है, के पद सन् 1985 के बाद नहीं भरे गये। वन रेंजरों, जिन्हें डी.डी.आर. कहा जाता था और जो कभी वन विभाग की रीढ़ समझे जाते थे, के पदों की परीक्षा 1986 से नहीं हुई है। अतः वन रेंजर, सहायक वन संरक्षक व प्रभागीय वनाधिकारी के पदों पर अधिकांशतः प्रभारी तैनात हैं। प्रभारी कभी भी पूर्ण अधिकार के साथ काम नहीं कर पाता और उच्च अधिकारियों की दया पर निर्भर रहता है। इससे कार्य मे शिथिलता व भ्रष्टाचार की संभावना रहती है। लंबे समय तक पद रिक्त रहने से एक साथ बड़ी संख्या में सेवा निवृत्ति होने से विभाग की निरंतरता टूटती है, जिसके गंभीर परिणाम होते हैं। अतः यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि वह कौन सी मजबूरी है जिसके तहत इतने लंबे समय से ये पद रिक्त हैं और प्रभारी बनाकर काम चलाया जा रहा है। इसका खामियाजा आम जनता को पर्यावरण के विनाश के रूप में भुगतना पड़ रहा है। उच्च पदों को ठूँस-ठूँस कर भरा गया है और रेंजर, वन दरोगा व वन रक्षक, जिनके ऊपर जंगलों की सुरक्षा की वास्तविक जिम्मेदारी है, के पदों व सुविधाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।
उत्तराखण्ड में वनों की बात हो तो चिपको आंदोलन का जिक्र होना लाजिमी है। ‘चिपको’ की मूल भावना यह थी कि वनों से ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाये, क्योंकि इससे वनों में अवैध पातन होता है और वे लगातार अवनत हो रहे हैं। लेकिन ‘चिपको’ की परिणिति वन निगम की स्थापना, वन्य जन्तु संरक्षण अधिनियम 1972, वनों को समवर्ती सूची मे शामिल करने व वन संरक्षण अधिनियम 1980 जैसे जन विरोधी कानूनों के रूप में हुई और जनता के हक-हकूकों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इससे जन सामान्य और वनों के बीच अलगाव बढ़ता ही गया और आज स्थिति हमारे सामने है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि भारतीय वन अधिनियम, जिससे कि सारे वन क्षेत्र नियंत्रित होते हैं, 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया। चिपको आंदोलन के पुरोधा इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साधे हैं ? वन विभाग यह दलीलें दे कर कि सारी आग मानवजन्य होती हैं, आग बुझाने में स्थानीय जनता का सहयोग नहीं मिलता, वनाग्नि के विषय में अपनी लाचारी व्यक्त करता है। यह बहाना भी जन सामान्य और वनों के बीच पैदा हुए अलगाव की ही पुष्टि करता है। इस अलगाव से निबटने के लिए वन विभाग के पास क्या है ? रोड के किनारे ‘वनों में आग बुझाने में सहयोग दीजिये’ सरीखे साईनबोर्ड व अग्नि सुरक्षा के संबध में अखबारों में अपीलें!
जंगलों के दोषपूर्ण प्रबंधन में चीड़ के जंगलों के क्षेत्रफल में लगातार वृद्धि व चौड़ी पत्तियों के वनों का क्रमशः ह्रास जैसे तथ्य भी हैं। इनसे वनों का घनत्व, जैव विविधता और नमी भी कम हो रही है (इसीलिए हमने पिछली बार वृक्षारोपण के स्थान पर संपूर्ण जैव विविधताके साथ वनों के पुनर्जनन की बात की थी)। वन विभाग के आला अफसरों का एक तर्क यह भी होता है कि ‘‘आग तो वन पारिस्थितिकी का अभिन्न भाग है।’’ मगर यह बात छुपा जाते हैं कि नमी भी वन पारिस्थितिकी का अभिन्न भाग और महत्वपूर्ण अवयव है। इस नमी के अभाव में ही जंगल बारूद की तरह जल उठते हैं और वनाग्नि बेकाबू हो जाती है। कोढ़ में खाज की तरह जंगलों में एक वन खण्ड को दूसरे से पृथक करने वाली फायर सुरक्षा लाइनों का तक रखाव नहीं हो पा रहा है और वे एक वन खण्ड से दूसरे में आसानी से फैल जाती हैं।
दावाग्नि के संबध में ब्रिटिश काल से चले आ रहे दोषपूर्ण सिल्वीकल्चर को भी समझना होगा। रामचन्द्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘अनक्वायट वुड्स’ में इसे ‘नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र का अपरिपक्व ज्ञान‘ कहा है। प्रकृति के तंत्र इतने नाजुक होते हैं कि जरा सी मानवीय भूल इन्हें ध्वस्त कर सकती है। अंग्रेजों ने व्यापारिक हितों के लिए सिल्वीकल्चर की आड़ में बाँज जैसे जैव विविधता युक्त जंगलों को चीड़ के मोनो कल्चर में बदला। देर सबेर जब इस प्रकार के सिल्वीकल्चर के दुष्परिणाम महसूस किये गये तो हमारे नीति निर्धारकों ने 1,000 मीटर से अधिक ऊँचाई के वनों में पातन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर पल्ला झाड़ लिया। जबकि दोषपूर्ण सिल्वीकल्चर का इलाज स्वस्थ सिल्वीकल्चर से होना चाहिये था, शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति से नहीं। वन विभाग इस नियम में बदलाव की हिम्मत नहीं कर पाता, क्योंकि उस पर विश्वविख्यात पर्यावरणविदों का दबाव है। मगर पर्यावरण सम्बन्धी गंभीर प्रश्नों का उसके पास कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं है। इस संबंध में सिल्वीकल्चर विशेषज्ञ मनोज चंद्रन की रिपोर्टपर ध्यान दिया जाना चाहिये, जिसमें 1000 मी. से ऊपर के वनों में चीड़ वनों के प्रबंधन के बारे में महत्वपूर्ण सुझाव दिये गये हैं।
जंगलों की अकूत संपत्ति का लेखाजोखा रखने की कोई विधि न होने से जंगलों की चोरी का उत्तरदायित्व निर्धारित करने का कोई तरीका विकसित नहीं हुआ है। इस कमजोरी और कुप्रबंध के बीच भ्रष्टाचार रोकना आसान नहीं है। इसीलिये गाँव-गाँव, शहर-शहर भारी पैमाने पर लकड़ी की तस्करी हो रही है। उधर उच्च हिमालयी क्षेत्र वन्य जन्तुओं व जड़ी बूटी की तस्करी के अभयारण्य बन गये हैं। वनों से प्रकाष्ठ के वैध उत्पादन और खपत की तुलना करने पर पता चल जायेगा कि आपूर्ति के बीच कितना गहरा अंतर है। यह अंतर तस्करी से पूरा हो रहा है। माना जाने लगा है कि तस्करी के सबूत नष्ट करने में आग बहुत कारगर होती है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि ग्रामीण घास की अच्छी उपज के लिए जंगलों में आग लगा देते हैं, हास्यास्पद है। अपनी आँखों के सामने तस्करी होती देख ग्रामीण क्यों आग बुझाने का जोखिम उठायेंगे ?
वन विभाग का गठन वन संरक्षण के लिये हुआ। मगर पर्यावरण की बदलती वरीयता व समस्याओं के साथ विभाग ने स्वयं को नहीं बदला। वह मात्र पर्यावरण जैसे विषय पर राष्ट्रीय व अंर्तर्राष्ट्रीय फंडों को खपाने में लग गया। वन विभाग पर्यावरण के नाम पर अधिकारियों के लिए नये-नये पदों के सृजन व मलाईदार प्रतिनियुक्तियाँ हथियाने में महारथ हासिल कर चुका है। ईको पर्यटन, जलागम, प्रदूषण नियंत्रण, आजीविका जैसे किसिम- किसिम के कार्यक्रमों में वह इतनी गहराई में धँस गया है कि अपने मूल कार्य, वन संरक्षण में उसकी कोई रुचि ही नहीं रही है। यदि इस प्रकार के कार्यक्रम आवश्यक ही हैं तो इनके लिये वन विभाग से अलग कोई निगम या बोर्ड बना दिया जाना चाहिये। ताकि वन विभाग वन संरक्षण के अपने मूल कार्य से भटके नहीं और उसी में विशेषज्ञता हासिल कर सके।
इस प्रकार संक्षेप में वनों की आग का एक ही कारण बताया जा सकता है- वनों का कुप्रबंध। इसें सुधारने के लिए कई मौलिक तथा कठोर बदलाव करने होंगे। वन विभाग के उच्चाधिकारी अब ‘वनविद्’ नहीं रहे। वे अपने ठाठ-बाट में नौकरशाहों से आगे निकल गये हैं। यह स्थिति आमूल बदलनी चाहिये तथा एक नयी कार्य संस्कृति विकसित होनी चाहिये। दावाग्नि जब फंडों का खेल नहीं रहेगी और वन विभाग के कुप्रबंध के रूप में देखी जायेगी, तभी इस समस्या का कोई स्थायी हल निकलेगा। आवश्यक है कि वन सम्बन्धी सभी नियम-कानूनों की पुनर्समीक्षा कर, हक-हकूकों व वनों के दावेदारों के साथ बैठकर एक कारगर नीति तैयार की जाय। यह कार्य अब कठिन होगा, क्योंकि वन अब समवर्ती सूची में होने के कारण इसके लिये केन्द्र सरकार की सहमति भी जरूरी है। अतः इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत पड़ेगी। वन विभाग के कार्यों की समीक्षा के लिए एक अन्य अधिकार प्राप्त संस्था की भी आवश्यकता है।
मानसून आते ही आग के निशान मिटने शुरू हो जायेंगे, पर जो क्षति हो गयी है, विशेषकर वन्य प्राणियों के झुलस कर अथवा भुखमरी से मरने की, उसका आंकलन नहीं हो सकेगा। अलबत्ता आग के कारणों का अपनी तरह से विश्लेषण कर राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय फंड हड़पने की कवायद जरूर शुरू होगी और फिर होगी फंडो की बंदरबाँट। बहुत सारे लोग तो दावाग्नि को देख-देख कर बंसी बजा रहे होंगे।