बात बुनियादी उठी
बात ये फिलवक्त की है साथियो ! इस देश में,
ये उदासी ऊपरी है साथियो इस देश में।![]()
आप अब तक शक्ल हिन्दोस्तां की जो समझा किये,
सिर्फ वैसा ही नहीं है साथियो ! इस देश में।
गांधी-गौतम के फरेबी फलसफे को चीर कर,
हुआ पैदा नक्सली है साथियो ! इस देश में।
लाठी-गोली-चार्ज-एनकाउण्टरों की हकीकतें,
गर जमाना जान ले क्या हाल हो इस देश में।
वह आजादी सैंतालीसी किसने दी किसको मिली,
बात बुनियादी उठी रे शासको ! इस देश में।
मुक्त होकर ही रहेगा देश अपना क्योंकि अब,
हर गुलामी देख ली है साथियो ! इस देश में
साथियो ! यह देश कैसा तब बनेगा होगी जब,
सर्वहारा की हुकूमत सोचिये इस देश में।
- गिर्दा
(संभवतः 1980-81 के दौरान लिखी गई यह कविता हमारी जानकारी के अनुसार अप्रकाशित है। – संपादक)