इण्टर कॉलेज कार्कीनगर के प्रबंध समिति के चुनावों में हुई धाँधली का मामला इन दिनों चर्चा में है। लोगों का आरोप है कि किसी बड़े राजनीतिक दबाव में कराए गए प्रबंध समिति के चुनाव असंवैधानिक हैं। इन्हें निरस्त कर पुनः चुनाव कराए जाएँ और दोषियों को दण्डित कर पठन-पाठन का वातावरण सुनिश्चित किया जाय।
इस कॉलेज की शुरूआत 1967 में हुई। दीवान सिंह पंचपाल के महत्वपूर्ण योगदान के साथ सनगाड़ निवासी पान सिंह मेहरा ने एक वर्ष तक इसका संचालन किया। इस कॉलेज के लिए लोहाथल ग्राम सभा के कार्की लोगों ने धरमघर के निकट सड़क नीचे 200 नाली अपनी जमीन दी थी। इसीलिए इसका नाम कार्कीनगर रखा गया। 1 जुलाई 1968 में इसे जूनियर हाई स्कूल की मान्यता मिली और मुनस्यारी निवासी हीरा सिंह धर्मशक्तू ने प्रधानाचार्य के पद की जिम्मेदारी सम्हाली। 1979 में हाईस्कूल की तथा 1984 को विज्ञान विषय की मान्यता मिलने के पाँच साल बाद आर्ट विषय के साथ इस विद्यालय को इन्टरमीडिएट की मान्यता मिली। 1968 से 2001 तक हीरा सिंह धर्मशक्तू इस कॉलेज के प्रधानाचार्य रहे और कॉलेज उत्तरोतर प्रगति करता रहा। यहाँ होने वाली रचनात्मक गतिविधियों का इस क्षेत्र के वातावरण पर खासा प्रभाव पड़ा। दूर-दूर से बच्चे यहाँ पढ़ने आते थे। हीरा सिंह धर्मशक्तू के बाद पान सिंह मेहरा ने प्रधानाचार्य का दायित्व सम्हाला और उनके बाद दान सिंह बाफिला ने। इस बीच स्थानीय राजनीति के साथ दलीय राजनीति का कुप्रभाव इस कॉलेज पर पड़ने लगा था। वर्तमान में के. आर. लापड़ इस कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य हैं। अधिकारसम्पन्न प्रधानाचार्य की नियुक्ति न होने से यह कॉलेज एक तरह से अनाथ सा हो गया।
वर्तमान में इस कॉलेज में करीब 600 छात्र हैं। 15 किमी. दूर बास्ती गाँव के अलावा सनगाड़, महरूड़ी, कराला, संगौड़, लोहाथल, खितौली, खौलागाँव, कितोली, चौकोड़ी, एराड़ी, सिमगड़ी, मझेड़ा आदि गाँवों के बच्चे इस कॉलेज में पढ़ने आते हैं। कॉलेज में प्रधानाचार्य सहित विज्ञान, गणित, अंग्रेजी आदि कई विषयों के अध्यापकों के पद रिक्त हैं। पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है और अनुशासन की कमी का असर पूरे इलाके में पड़ रहा है।
कुछ वर्ष पूर्व यह कॉलेज शराबजनित अराजकता के केन्द्र में रह कर बदनाम हुआ तो इस बीच प्रबंध समिति के चुनावों में बरती गई धांधली को लेकर चर्चा में है। जिस उहापोह की स्थिति में कॉलेज प्रबंध समिति के चुनाव कराये गये उससे साफ जाहिर होता है कि कुछ दाल में काला है। प्रभारी प्रधानाचार्य भी दबी जुबान में उन पर ऊपर से दबाव होना स्वीकार करते हैं।
रा.इ.का. पाँखू की भी सुध लें
राजकीय इन्टर कॉलेज पाँखू का भवन जीर्ण-क्षीण हो चुका है। नये भवन निर्माण की स्वीकृति शासन से न मिल पाने के कारण अब छात्रों के बैठने की समस्या उत्पन्न हो गई है। अभी छात्रों के प्रवेश फार्म भरे जा रहे हैं। इस बार छात्रों की संख्या 600 से अधिक होने का अनुमान है। कॉलेज भवन, शिक्षकों की कमी आदि समस्याओं से कॉलेज प्रशासन व अविभावक संघ द्वारा शिक्षा विभाग व शासन को पिछले कई वर्षों से लिखापढ़ी करने के बावजूद इस कॉलेज का सुध लेवा कोई नहीं है।
वर्तमान में जहाँ पर पाँखू का रा.इं.कॉ. है, वहाँ साठ साल पूर्व जूनियर हाई स्कूल था। बाद में इसे इन्टर करने के बाद इसके लिए नया भवन बनाने के बजाय काफी हो-हल्ला करने पर कुछ अतिरिक्त कक्ष और जोड़ दिए जाते रहे। विद्यालय भवन व बाउंडरी वॉल बनाए जाने का मामला हर वर्ष उठाया जाता रहा और प्रस्ताव व एस्टिमेट बनाकर शासन को भेजे जाते रहे। लेकिन उनकी फाइलें दबा दी जाती हैं। प्रधानाचार्य उत्तम सिंह गढ़िया बताते हैं कि इस बार पुनः स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान के तहत प्रस्ताव व एस्टिमेट बनाकर शासन को भेजा है, उम्मीद है स्वीकृति मिल जाएगी। न मिली तो यह मामला लटका रह जाएगा और छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी। पिछले कई वर्षों से यहाँ शिक्षकों की भारी कमी रही है। अंग्रेजी के प्रवक्ता तो पिछले 20 साल से नहीं हैं। भाषा के 3 पद, संस्कृत का एक पद रिक्त है। गणित का पद तो सृजित ही नहीं है। हालाँकि पिछली बार कक्षा 11 से गणित की कक्षाएँ प्रारम्भ की गईं हैं, लेकिन पद सृजित न होने अथवा गणित पढ़ा रहे अध्यापक भूपाल सिंह मेहता का किसी और स्थान को स्थानान्तरण हो गया तो फिर समस्या हो जाएगी। कॉलेज परिसर के चारों ओर बाउंडरी वॉल न होने से अतिक्रमण होने के साथ ही जानवर अन्दर धुस जाते हैं और गन्दगी के अलावा उजाड़ कर जाते हैं।


























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