उत्तराखंड राज्य की स्थाई राजधानी बनाने के लिए गोपेश्वर में अक्टूबर 21 से आरंभ की गई भूख हडताल, 37 दिन बाद, नवंबर 27 को समाप्त कर दी गई. इस अंतिम दिन गोपेश्वर देहरादूऩ, रामनगर, अल्मोड़ा, श्रीनगर, जोशीमठ, इत्यादि जगहों से पक्की राजधानी के समर्थक लोग, यह तय करने कि उसको आगे बढ़ाने के लिये कहाँ-कहाँ क्या क्या कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
इन प्रतिनिधियों की सभा में राज्य की भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सचिव, समर भंडारी ने कहा कि गोपेश्वर में भूख हडताल को और आगे चलाना कठिन हो रहा है, इसलिए उसकी समाप्ति कर देनी चाहिए, और राजधानी के मुद्दे पर एक नया कार्यक्रम आरंभ किया जाना चाहिए। कम्यूनिस्ट पार्टी ने ही गोपेश्वर में भूख हड़ताल की शुरूआत की थी।
कई प्रतिनिधि उस भूख हड़ताल को और आगे चलाने के पक्ष में थे और उसके समर्थन में वे अन्य कई स्थानों में सभाएं, धरना-प्रदर्शन तथा भूख हड़तालें आयोजित करने की योजना बनाने को थे, ताकि इस आंदोलन को और आगे बढ़ाया जा सके. उनके सुझाओं की अनदेखी कर तय किया गया कि 15 दिसंबर को देहरादून में विधान सभा सत्र शुरू होने पर, राज्य भर में इस मुद्दे पर ब्लॉक-स्तर पर तालाबंदी, धरना-प्रदर्शन तथा उपवास आयोजित किए जांय, और जनवरी 11 को राज्यभर से राजधानी-आंदोलनकारी देहरादून कूच करें और अगले दिन वहाँ मुख्यमंत्री के आवास का घेराव करें। यह भी तय हुआ कि राजधानी पर न्यायाधीश दीक्षित आयोग की रिपोर्ट का खुलासा करने के लिए जोर लगाया जाय। यह आशा की जा रही है कि विधान सभा सत्र में कुछ विधायक इस रिपोर्ट का खुलासा करने का जोर लगाएंगे। लोग आश्चर्य में हैं कि इस रिपोर्ट को राज्य सरकार क्यों गोपनीय रखना चाहती है?
कार्यक्रम तय करने के बाद दो उपवास पर बैठे आंदोलनकारियों को जूस पिला कर उठा दिया गया। इससे कुछ आंदोलनकारियों में असंतोष रहा। वह गोपेश्वर के उपवास को समाप्त करने के बजाय उसी तरह का कार्यक्रम अन्य स्थानों में आरंभ करवाना चाहते थे, जो संभव नहीं हो सका। यह तय हुआ कि इस मुद्दे पर रुद्रप्रयाग में चल रही भूख-हडताल को चलने दिया जाय।
गोपेश्वर के 37 दिन के उपवास ने स्थाई राजधानी के मुद्दे को गरमा दिया था। सारे राज्य में सब जगह उसकी चर्चा होने लगी थी. कांग्रेस तथा भाजपा से जुडे ल¨गों को छोड़ बाकी उसके समर्थन में आ रहे थे। उत्तराखंड क्रांति दल के उच्चस्थ नेताओं के अलावा उसके सामान्य सदस्य इस लड़ाई में भाग लेने की सोच बना रहे थे। इस मांग का राज्य के बुद्धिजीवियों का भी समर्थन था। इस हड़ताल की समाप्ति पर सब पीछे चला गया है।
लोगों को लगता है कि सब कुछ देहरादून में केन्द्रित हो रहा है, जिससे वे प्रसन्न नहीं हैं। देहरादून में बैठे राजनेताओं को दूर-दराज के क्षेत्रों की समस्याएं न सुनाई देती हैं और न ही उनके समाधान के उपायों के बारे में सोचना पड़ता है।

























अब जब भी उत्तराखण्ड की विधान सभा का सत्र हो तो उत्तराखण्ड की जनता एक समानान्तर सत्र गैरसैंण में आयोजित करेगी। जिसमें सभी विधायकों से आग्रह किया जायेगा कि राजधानी शहीदों और आन्दोलनकारियों तथा आम उत्तराखण्डी की भावनाओं के अनुसार गैरसैंण ही है। तो आप लोग भी यहीं आ जाओ करके…..देखते हैं ७० विधायकों में से कितने उत्तराखण्डी निकलते हैं।