कुछ दिन पहले हुए अण्णा हजारे के अनशन के दौरान युवाओं का जोश देखने लायक था। उनकी सक्रियता से ऐसा लगा कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिले या न मिले, मगर युवाओं को तो इस आंदोलन ने जगा ही दिया है। इस दौरान फिल्मी कलाकारों से लेकर राजनीतिक पार्टियों के लोगों तक में तिरंगा लहराते हुए देशभक्त दिखने की होड़ लगी थी। मगर सच्चाई तो बापू के जन्मदिवस पर दिखी, जब न तो देशभक्ति की बात करने वालों का हजारों का जनसैलाब था और न ही देश को हिला देने वाली युवाओं की हुंकार। इस घटना ने बताया कि सिर्फ वन्देमातरम का नारा लगा देने या लंबे-चौड़े भाषण दे देने भर से बात नहीं बनेगी। ज्यादातर लोग तो बापू की जंयती को सिर्फ सरकारी छुट्टी मानते हैं। इन सब से हट कर भी अगर हम बापू के नाम पर बनायी गयी संस्थाओं पर नजर डालें तो मालूम पड़ता है कि सरकार, प्रशासन और जनता उनकी सुध सिर्फ गांधी जयंती पर ही लेते हैं।
ऐसी ही एक संस्था है चनौदा स्थित गाँधी आश्रम। स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस संस्थान में मुख्यतः ऊन से बनने वाले खादी कपड़ो का निर्माण होता है। 1929 में कुमाऊँ का दौरा करते हुए महात्मा गाँधी 21 जून को कौसानी पहुँचे थे। 1 जुलाई तक कौसानी में रहते हुए उन्होंने ‘अनासक्ति योग’ नाम से श्रीमद्भवतगीता की टीका लिखी। बौरारो घाटी में घूमते हुए उन्होने अपने शिष्य शांतिलाल त्रिवेदी को आदेश दिया कि वे चनौंदा में खादी का कार्य करें। शांतिलाल त्रिवेदी ने गांधी आश्रम स्थापित किया जो कालान्तर में बौरारो क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना का केन्द्र बन गया। इस संस्था का 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
गांधी आश्रम, चनौंदा के वर्तमान मंत्री हेम चन्द्र पंत बताते हैं कि सन् 1929 में स्थापना के बाद से आश्रम द्वारा उत्तरोत्तर वृद्धि करते हुए यहाँ के ऊनी उत्पादों, जो मुख्यतः तिब्बती कच्चे ऊन से निर्मित थी, को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत का ऊन भारत आना बन्द हो गया। गांधी आश्रम को अपना काम जारी रखने के लिए पानीपत, लुधियाना व राजस्थान आदि के ऊन पर निर्भर होना पड़ा। कच्चे माल की ऊँची कीमतों के कारण आश्रम के लिये आसपास के गाँवों में हजारों की संख्या में बिखरे बुनकरों को कच्चा माल दे पाना सम्भव नहीं रहा। कत्तिन बुनकरों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती चली गयी। जिन लोगों का यह पांरम्परिक पेशा था, वे भी इससे दूर होते चले गये। वर्तमान में आश्रम के पास बमुश्किल लगभग 450 कामगार हैं। तरल पूँजी के अभाव व कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों के कारण आश्रम उनको भी पूरा काम नही दे पा रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि लोग काम करने की क्षमता तो रखते हैं, पर पूँजी के अभाव में कुछ कर पाने में असमर्थ हैं।
ऐसा ही हाल नैनीताल से पाँच किमी दूर गांधी ग्राम ताकुला का है। 1929 में महात्मा गांधी यहाँ आकर ठहरे थे और उन्होंने ‘गांधी मंदिर’ नामक एक भवन की नींव रखी थी। 1931 में महात्मा गांधी एक बार पुनः ताकुला आये और गांधी मन्दिर में ही ठहरे। लेकिन विडंबना यह है कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होने के बावजूद न कोई अधिकारी और न कोई जनप्रतिनिधि ही गांधी जी को श्रद्धांजलि देने गांधी मंदिर जाता है। कोई विभाग भी ऐतिहासिक गांधी मन्दिर की देखरेख के लिए आगे नहीं आया है।
sirf nam japne ke liye nahi hai gandhi……….
shukriya nainital samchar ko ki unhone apne is lekh ke madhyam se gandhi ke bhawano ko samne rakha……..