हिट हो आब गङ् नै ऊनूँ !
यो उतरैणि ऐ गे छ माघ में, पुण्य भै वीकें कमै ल्यूँ।।
आब काँ रै गे गङ अहो ! आब पाणि न्हैति इन गंगन में।
सब गाड़न में रूढ़ बरसि गै, ढुङ डाव रेत भरी सबन में।।
जौलजीवि, बागसर, जागिसर, सबे अलीत-पलीत बणै।
गङ बै सिरि सब उज्याडि़ हाली, आब पाणी चोर ठ्याकदारन लै।।
आब गङ्ल्वाड़ लै बेचण भै गईं, डान कान कोई सुरक्षित नै।
गाड़ बगी गै यो विकास की, स्यार व्यार निमड़ी चिमड़ी गै।।
कँई बणै दी बाँध, र्कइं उड्यार, कैं सड़क सुरंग हजारन की!
कँई पैर छन कँई स्वैर छन, सारै देश उत्तराखन की।।
नान्तिन प्वाथ प्वोथी उत्तराखन का, घुघुतै माल छोडि़ माल गया।
कालै काले घुघुती खाले ! को धत्यूँछ! यास हाल भया।।
तेल नि मिलनो, काँ छ दूध घ्यू, चौपट भै सब गाँवन की।
भट गहतै लै दुर्लभ है गै, मडुवा मादिर काँ न्हैगे।।
काली, गोरी, धौली गंगा, लधिया, लोहवती काँ रै ?
यो पनार, कोसी, रामगंगा, सरजू गोमति सुकन परै।।
ऊ ध्वज, कूलूर, गौरैघाटी, गंगा, भिलंगना, जमुना।
भागिरथी, अलखनन्दा औ विष्णुगाड़ बासुकि गंगा।।
आज सबै प्यासी छन, सबै आज निश्वासी छन।
स्वीण है गई ऊ दिन, जब कल-कल, छल-छल छी।
उन्मद, निश्छल निर्मल गंगे, सरल धार विस्तृत छी।
सुकणै गै सब ताल सरोवर, गंग बणी धारा दुबली।।
कैं लै पाणी नी रै गयो, सुखी गया नौल चुपटौल।
यतुकै पाणि लै नी मिलनो आब, डुबै सकूँ जाँ नान्-नान् फौंल।।
गाड़ गध्यारन की यो गति भै, उनन में बसनी सौल।
कै गङ जै आब नानूँ ?
- कौस्तुभानन्द पंत
(कहावत छै ‘‘गंङ पार सौलाक बाबुक के छ ?’’ आब गाड़ सुकि गई तौ सब सौलक राज है गौ छ।)
भावानुवाद
उत्तरायणी आ गयी है। गंगा स्नान का पुण्य कमा लें। लेकिन अब गंगा में पानी कहाँ ? छोटी-बड़ी नदियों में रेता-बजरी व बोल्डर भर गये है। बागेश्वर, जागेश्वर जैसे तीर्थ अपवित्र हो गये। गंगा की शोभा नष्ट कर पानीचोर ठेकेदारों ने विकास के नाम पर अच्छी कृषि भूमि बर्बाद कर दी। रोड़े-बजरी, पत्थर बिकने लगे। डांडे-काँठे भी सुरक्षित नहीं। कहीं बाँध बन गये हैं तो कहीं सुरंग खोद पानी डाला जा रहा है, भूस्खलन व पहाड़ों का रड़ना-बगना जारी है। काली, धौली, गंगा, लधिया, लोहावती, पनार, कोसी, रामगंगा, सरयू, गोमती सूख गई हैं। ध्वज, कूलूर, गौरीघाटी, गंगा, भिलंगना, जमुना, भागीरथी, अलकनन्दा और विष्णुगाड़ बासुकीगंगा बेहाल हैं। नौले-धारे, ताल, चुपटौल सब सूखने लगे हैं। कौन सी गंगा में नहायें ? युवा व बच्चे पलायन कर गये हैं। घुघुतों की माला पहन कर ‘काले कव्वा काले-घुघुती खाले’ कौन कहेगा ? तेल मिल नहीं रहा और गाँवों से दूध-घी भी चौपट हो गया है। भट्ट गहत की दालें तो दुर्लभ होने लगी हैं और मडुवा-मादिरा भी न जाने कहाँ गायब हो गया। नदियों में गगरी डुबाने लायक पानी भी नहीं रहा।