प्रस्तुति : पुष्पा चौहान
वर्ष 1989 में उत्तर प्रदेश सरकार की (14.3.89) राजाज्ञा सं. 3962/वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 35(1) के अन्तर्गत लंका (भैंरोंघाटी) ब्रिज से ऊपर का 2,39,002.4 हैक्टेयर क्षेत्र गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। दावा किया गया कि इससे वन्य जीवों तथा चीड़बासा व भोजबासा के पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण भोजपत्र के वृक्षों का संरक्षण व संवर्द्धन होगा। 13 से 30 जून 2010 तक इंडियन माउन्टेनियरिंग फाउण्डेशन, दिल्ली की टीम के साथ गंगोत्री से चौखम्बा बेस तक फोटोग्राफर के रूप में यात्रा करते हुए मुझे इस उद्यान की वास्तविकता का अध्ययन करने का मौका मिला।
गंगोत्री से आगे गौमुख मार्ग पर लगभग 4 किमी. आगे वन विभाग की कनखू स्थित चौकी पर यात्रियों एवं पर्वतारोहियों की गहन जाँच की जाती है। यहाँ वन विभाग पास चैक करने में जितना मुस्तैद दिखता है, उतना ही बेपरवाह उद्यान क्षेत्र में नियम-कानूनों को लागू करने में दिखता है। इसका अनुभव कदम-कदम पर होता है। कनखू चौकी पर चस्पाँ जानकारी के अनुसार प्रतिदिन यहाँ से भोजवासा तक मात्र 15 खच्चरों को जाने की अनुमति है। लेकिन हमने 25 से 28 खच्चर भोजवासा तक जाते हुए पाये।
2008 में गंगोत्री से गौमुख तक स्थानीय युवकों द्वारा चलाये लगभग आधा दर्जन ढाबों को पर्यावरणीय संवेदनशीलता के मद्देनजर तोड़ा गया। मगर विभिन्न आश्रमों के नाम पर चलने वाले अतिथि आश्रमों का बाल भी बाँका नहीं हुआ। वन विभाग की चीड़वासा स्थित चौकी एवं लोक निर्माण विभाग के गैंग हाउस में अवैध ढाबों का संचालन हो रहा है। पी.डब्ल्यू.डी. के गैंग हाउस में तो बाकायदा रात्रि विश्राम की भी व्यवस्था है। मजदूरों के लिये बने भवन से अच्छी कमाई की जा रही है। नियमानुसार यहाँ लकड़ी जलाना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। इसका लिखित आदेश इस क्षेत्र में कार्यरत संस्था हादरी की निदेशक डॉ. हर्षवन्ती बिष्ट को दिया गया है, इस चेतावनी के साथ कि यदि ऐसा होता पाया गया तो विभाग उन्हें नर्सरी व वृक्षारोपण हेतु प्रदान की अनुमति को निरस्त कर देगा। मगर चीड़वासा में पी.डब्ल्यू.डी. के 25-30 मजदूरों का खाना लकड़ी पर ही पकाया जाता है। पी.डब्ल्यू.डी. गैंग हाउस के अवैध ढाबे पर भी लगातार लकडि़याँ ही जलती हैं। हद तो तब हुई, जब 29 जून की रात चौकी से मात्र 200 मीटर नीचे कैम्प क्षेत्र चीड़वासा में रेड चिली ग्रुप के लोगों द्वारा कैम्प फायर के नाम पर भोजपत्र की लकड़ी के ढेर को राख में तब्दील कर दिया गया।
राष्ट्रीय पार्क घोषित होने के पश्चात् पार्क क्षेत्र के भीतर हर तरह की लीज खत्म हो जानी चाहिये थी। लेकिन इसके उलट इस बीच यहाँ कई स्थायी व अस्थायी डेरे विकसित होते रहे। 1972 में भोजवासा में श्री लाल बिहारी बाबा आश्रम के नाम वन विभाग द्वारा 0.0320 है. भूमि लीज पर दी गयी, जिसे 2002 में बाबा की मृत्यु के पश्चात् स्वतः ही खत्म हो जाना चाहिये था। लेकिन इस बाबत कोई भी कार्यवाही विभाग द्वारा की गयी हो, ऐसा नहीं दिखा। गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क कार्यालय कहता है कि पहले भी ये मसला उठा था और तब हमने आश्रम के लोगों से कहा था कि यदि आपके पास कोई कागज है तो दिखा दो।…..बस! वैसे भोजवासा में लाल बाबा आश्रम परिसर के कमरे में ही वन विभाग का कार्यालय भी चलता है। विभाग के दो कर्मचारी भी स्थायी रूप से यहीं रहते हैं। आश्रम में 250 रु. प्रतिदिन के हिसाब से सुविधा शुल्क देकर कितने भी दिन रहा-खाया जा सकता है। आश्रम परिसर में ही अलग से अपनी पसन्द का खाना स्वयं बनाकर खाया जा सकता है। इसी आश्रम के दाहिनी ओर लगभग 100 मीटर की दूरी पर लाल बिहारी बाबा के शिष्य राम बाबा, जिन्हें लाल बाबा ने शादी करने पर आश्रम से अलग कर दिया था, ने भी 5-6 तम्बू गाड़कर झंडा गाड़ा है। यहाँ पर भी यात्री आकर ठहरते हैं। इनकी किसी लीज आदि का जिक्र पार्क के अभिलेखों में नहीं है। भोजवासा में गढ़वाल मंडल विकास निगम के कर्मचारियों से जानकारी मिली कि तकरीबन 5 साल पहले बर्फ का एवलांच आने से निगम के विश्राम गृह का आधे से ज्यादा हिस्सा टूट गया। लेकिन तब से पार्क के नियम का हवाला देते हुए इसके पुनर्निर्माण की अनुमति आज तक नहीं दी जा रही है।![]()
गौमुख से आगे तपोवन में मौनी बाबा आश्रम (पूर्व में शिमला बाबा आश्रम) में चार कमरों का पक्का टिन की छत का निर्माण है। तारा बंगाली माता भी एक गुफानुमा कमरे जैसे आश्रम में रहती हैं। एक बार वन विभाग द्वारा कई गुफानुमा आश्रमों को तोड़ा गया। उक्त बंगाली माता की टिन भी उठा कर ले गये। बंगाली माता का कहना है कि वन विभाग वाले हमारे साथ दोहरा व्यवहार करते हैं। यदि तोड़ना है तो एक तरफ से सबका निर्माण तोड़ो। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। तपोवन में जो पक्का टिन छत का बड़ा निर्माण है, वहाँ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।
गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क के भीतर की ये स्थितियाँ पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक माहौल पैदा कर रही हैं। उद्यान के कर्ताधर्ताओं की कार्यशैली व कार्यवाहियों पर भी एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है। पर गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क का मुद्दा उठाये कौन ? जनमुद्दा यह इसलिये नहीं बना कि इससे आम जनता के सीधे हित नहीं जुड़े हैं। दैनिक समाचार पत्रों के पास शहरों में होने वाले उद्घाटनों व प्रेसवार्ताओं से फुर्सत हो तब उनका ध्यान इस ओर जाये। रही बात ऐसी सामाजिक संस्थाओं की, जिनका क्षेत्र ही पर्यावरण हैं तो उनकी अपनी सीमायें हैं। उनका अपना एक खोल है, जिससे वे बाहर न वे आ सकती हैं और न ही आना चाहती है। लेकिन यदि गंगोत्री ग्लेशियर का अस्तित्व लम्बे समय तक कायम रखना है तो इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा। आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रही है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्रीय घोषित उद्यानों में सख्ती से नियमों का पालन हो।